प्रियसी से हुई पत्नी की मुलाक़ात,
बातों ही बातों में चली हमारी बात।
डूबी हुईं थीं दोनों ही जज्बातों में,
दिख रहा था प्रेम उनकी बातों में।
प्रियसी ने जब पूछे कई सवाल,
पत्नी ने उधेड़ दी मेरी ही खाल।
प्रियसी: क्या तुम्हें प्यार करते हैं भरपूर?
पत्नी: नहीं, पास आते ही भागते हैं दूर।
प्रियसी: क्या मेरे जैसे तुम्हें कहते बाबू?
पत्नी: नहीं, मेरे सामने तो रहते हैं काबू।
प्रियसी: क्या आँखें दिखती हैं झील जैसी?
पत्नी: नहीं, मैं लगती हूँ उनको चील जैसी।
प्रियसी: क्या ज़ुल्फ़ें उँगलियों में उलझाए रहते हैं?
पत्नी: नहीं, मेरे सामने तो दुम दबाए रहते हैं।
प्रियसी: क्या चाँद-तारे तोड़ने के वादे करते हैं?
पत्नी: नहीं, ये हर सपने को आधे करते हैं।
प्रियसी: क्या तुम्हें सुनाई कोई शायरी नई ?
पत्नी: नहीं, पागलों जैसी हरकतें हैं कई।
प्रियसी : क्या मानते हैं तुम्हारी सभी बात?
पत्नी : नहीं, ऐसे भूत कहां मानते बिन लात।
प्रियसी : क्या तुम्हें ले गए कभी कोई बाजार?
पत्नी : नहीं, मुझसे खुद मांगते फिरते उधार।
प्रियसी: क्या तुम्हारे लिए जान देने कसम खाई?
पत्नी: नहीं, मुझे तो खुद लगते हैं बड़े कसाई।
प्रियसी : क्या कुछ बाकी है खोलना कोई पोल?
पत्नी : नहीं, मेरे पति हैं जैसे 'दूर के सुहाने ढोल'।
- सुमित राठौर
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