Saturday, August 15, 2026

सुन बे! जंतर-मंतर के जेन ज़ी

जंतर-मंतर से 'जीत' का गुब्बारा फुलाए जेन ज़ी का एक नमूना मुझसे मिला। बोला- अंकल! हमने आज एक बहुत बड़ी जंग जीत ली है। 

उसकी नजर में मैं अंकल ही था, भले ही मैं खुद को आमिर खान समझूँ। 

खैर, 

मैंने पूछा- कैसी जंग? वो बोला- "वी टुक द रेजिग्नेशन ऑफ ए मोदी गवर्नमेंट'स मिनिस्टर...।" 

मैंने लंबी सांस खींचते हुए कहा ओह...कांग्रेचुलेशन। 

मुझे अंग्रेजी इतनी ही आती है। चूंकि अंग्रेजी पीता नहीं हूँ इसलिए बोल भी नहीं पाता।

उसके जाने के बाद मेरे दिमाग में एक जंग शुरू हो गई। मेरे मन में आया कि हमने जिस तरह का फूहड़ प्रदर्शन जंतर-मंतर पर देखा है, अगर जेन ज़ी इसे जंग कहेंगे तो फिर वो क्या है जो हमारे सेना के जवान सरहद करते हैं। यदि यही जेन ज़ी आगे चलकर सेना में भर्ती हो गया तो फिर क्या होगा? इन्हें मोबाइल से मीम, रील बनाने से फुर्सत नहीं है। कंटेंट क्रिएटर के नाम पर क्या नहीं करते। यदि यही मोबाइल पर अंगुलियां घिसने वाला जेन ज़ी सेना में भर्ती हो गया तो जंग कैसे लड़ेगा? रातभर मस्ती में मीम और रील बनेंगे, दूसरी ओर दुश्मन हमारी रेल बना देंगे।

   आज का जेन ज़ी न टाइम पर उठता है, न खाता है, न नहाता है, बस स्क्रीन से चिपका रहता है। मसखरी करने वाली ये पीढ़ी अगर भविष्य की फौज बनी, तो ट्रेनिंग भी क्या यूट्यूब, गूगल जिमेनाई, चैट जीपीटी या एलेक्सा से लेगी?

मैं इतना सोच ही रहा था तभी वह फिर लौटकर आया। मैंने उसे पास बैठाया और कहा- सुन बे! जंग वो नहीं होती जो तुम जंतर- मंतर पर जीतकर आये हो। असली जंग तो सरहद पर होती है। जिस मोदी सरकार को तुम झुकाने की बात कर रहे हो, उसने देश कभी झुकने नहीं दिया....उसने तो न जाने कितनी बार इस देश का मस्तक ऊंचा किया है। जंग वो होती है जब कोई पुलवामा और उरी जैसी हरकत करता है तो सर्जिकल और एयर स्ट्राइक कर हम घर में घुसकर मारते हैं। कोई पहलगाम करता है तो ऑपरेशन सिंदूर होता है। जंग तो जवान लड़ते हैं। मोदी सरकार आने से पहले क्या जेन ज़ी ने हिम्मत की कि कश्मीर के लाल चौक पर तिरंगा फहरा पाए... क्या किसी जेन ज़ी ने हिम्मत की कि वो भारत माता को धारा 370 की बेड़ियों से मुक्त करने के लिए आंदोलन करे। यही जेन ज़ी जब रूस और युक्रेन के युद्ध में फंसता है सबसे पहले मोदी को ही याद करता है..दूसरे मुल्कों के जेन ज़ी भी तिरंगा पकड़कर सुरक्षित लौट आते हैं। युद्ध, गृहयुद्ध, राजनीतिक संकट, महामारी और प्राकृतिक आपदा जैसी हर परिस्थितियों में कई बार विदेशों में फँसे भारतीय नागरिकों को निकाला है। इसलिए मुझे तो लगता है कि तुम जिस जंतर-मंतर की जीत का जश्न मना रहे हो वो तुम्हारी बड़ी हार है। जीता तो कोई और है... शायद इस्तीफे से इस देश पर मंडरा रहे बहुत बड़े संकट पर जीत हुई है। इसका पता तुम्हें समय आने पर चलेगा....

तभी जेन ज़ी बोला- अच्छा अंकल मैं चलता हूँ...

मैंने सोचा - अरे यार ये फिर अंकल कह गया....

कॉकरोच और कूड़ेदान

भारत में बहुत आजादी है। रहने की, खाने की, बोलने की, घूमने की...और तो और पार्टी बनाने की। भारत के मुख्य न्यायाधीश साहब ने एक टिप्पणी क्या कर दी अमेरिका में बैठे लड़के ने राजनीतिक पार्टी ही बना ली। कॉकरोच जनता पार्टी। मुझे लगता है उसने ज्यादा ही सीरियली ले लिया। सुना है दिल्ली में सरकार के खिलाफ बड़ा प्रदर्शन भी किया है। ये भी सुनने में आया है कि जैसे ही पुलिस जब 'हिट' बनकर सामने आई, उस जैसे कई कॉकरोच किसी न किसी कोने में जाकर छिप गए। लेकिन कुछ भोले-भाले कॉकरोच तो पिट गए। 

एक बात कहूंगा कि भाई हम भारतीय हैं। हमें क्यों बेवकूफ बना रहे हो। एक आदमी पहले ही झाड़ू लेकर जनता को मूर्ख बनाता घूम रहा है। हम जानते हैं कि तुम्हारे पीछे कई बड़े कॉकरोच हैं। इन कॉकरोच की संख्या बढ़ती जा रही है। ये देश के अलग-अलग राज्यों फैले हुए हैं। चुनाव आते ही अपना गठबंधन बना लेते हैं। ये कॉकरोच बहुत मौका परस्त दिखाई देते हैं। कभी साथ रहते तो कभी अलग-अलग। यूपी, हैदराबाद और दिल्ली का टोपी वाला...एक टीशर्ट वाला... जब लगता खतरा है तो एक हो जाते हैं...। बंगाल की एक मादा कॉकरोच ने तो बिल्कुल नाक में दम कर दिया था... वो तो दूसरे देश से भी कॉकरोच लाकर यहां पाल रही थी। कुछ कॉकरोच तो इतने बहरूपिये होते हैं कि कभी किसान बन जाते हैं, कभी पर्यावरणविद, कभी पत्रकार तो कभी राजनेता। अलग-अलग भेष में दूसरों के लिए पिच तैयार करते हैं। आजकल तो देख रहा हूँ मनोरंजन जगत में भी कई कॉकरोच घुस गए हैं। 

खैर छोड़ो.... जज साहब ने कॉकरोच कह दिया तो तुम इतना क्यों बुरा मान गए भाई...? ऐसे हर कोई बुरा मानने लग जाएगा तो रोज नई पार्टियां खड़ी हो जाएंगी। किसी को मच्छर कह दिया तो वो 'मच्छर मोर्चा' बना लेगा। गधा कहने पर 'गधा गठबंधन' और उल्लू कहते ही 'उल्लू विचार मंच' बना सकता है। 

गधा, उल्लू जैसे विश्लेषण तो हमें हमारे पिताजी, दोस्तों, रिश्तेदारों और अधिकारी से कई बार मिलते रहे हैं। लेकिन मजाल है कि हमने कभी गंभीरता दिखाई हो। मेरे मन में भी कई बार आया कि ऐसे उटपटांग संगठन बनाऊं लेकिन मैंने कभी सीरियसली नहीं लिया। 

मैं तो कहता हूँ वापस अमेरिका लौट जाओ। 

क्योंकि ये सरकार बड़ी हिट है... इसने तुम जैसे सैकड़ों कॉकरोच को देश से बाहर फेंक दिया है। जाकिर नाइक, ध्रुव राठी, गुरपतवंत सिंह पन्नू को तो जानते ही होंगे। कुछ कॉकरोच भारत में रहकर कभी-कभी बिल से बाहर निकलते हैं, उनका भी इलाज कर दिया जाता है। यासीन मलिक, शरजिल इमाम, उमर खलीद, ताहिर हुसैन जैसों से भी आपका परिचय होगा ही। 

इसलिए भाई, पार्टी बनाओ, पोस्टर छपवाओ, प्रेस कॉन्फ्रेंस करो... लेकिन याद रखना, लोकतंत्र में आखिरी फैसला न कॉकरोच करते हैं, न मच्छर, न उल्लू और न ही गधे। आखिरी फैसला हमेशा जनता करती है। बस एक सलाह है कि प्रोटेस्ट करो, प्रोपेगेंडा मत फैलाओ...। नीट की बात करो लेकिन चीट मत करो...। हम अन्ना हजारे की आड़ में हुए एक प्रयोग से धोखा खा चुके हैं।

और आखिरी बात...लोकतंत्र में पार्टी बनाने की आजादी है, लेकिन जनता को यह भी आजादी है कि चुनाव आते ही ऐसे प्रयोगों को सीधे कूड़ेदान में डाल दे। 

- जय हिन्द।

Saturday, April 25, 2026

मुक्तक

मैं रोजाना अपने हाथ मलता हूँ,
जो जैसा चलाये, वैसा चलता हूँ।

कुछ हैं जो अब भी जान लुटाते हैं, 
किसी-किसी को बहुत खलता हूँ।।

चुटकी

 करके 'आप' में बड़ा खड्डा,
साथियों संग निकले चड्ढा।
झटका देकर केजरीवाल को,
भाजपा को बना लिया अड्डा।।

Tuesday, December 9, 2025

संदेश

जो जिंदगी सिंखाती है
वो कोई नहीं सिखा सकता।

Wednesday, August 6, 2025

चुटकी

 रोज नया बयान, रोज नई करतूत,
अमेरिका को मिला सिरफिरा पूत।
हो गया है मुझे अब तो पूरा यकीन, 
ट्रम्प में घुस गया है राहुल का भूत।। 


Tuesday, July 15, 2025

सीख

किसी को भी सीख मत दो 
क्योंकि बाद में यही सीख 
सीख की तरह चुभती हैं 

Saturday, July 5, 2025

चुटकी

 चेहरे पर चेहरा ओढ़ना भी एक कला है 

हर आदमी खुद जानता है कि वो कितना कमीना, कितना भला है

Friday, October 4, 2024

नेताजी की अंत्‍येष्टि


शहर के बड़े नेताजी मर गये। बड़े इसलिए नहीं क‍ि वे बड़े ज्ञानी, परोपकारी, दयालु, ईमानदार और संस्‍कारी थे। इन गुणों से उनका कोई लेना-देना नहीं था। उनकी ख्‍याति दूर-दूर तक थी। वे बाहुबली थे। भ्रष्‍टाचार में उनका मुकाबला करने की ताकत किसी में नहीं थी। जितने अवगुण होते हैं, वे सब उनमें थे। उनके परलोक जाते ही मानो हमारा शहर देवलोक हो गया हो। अधिकतर शहरवासी खुश थे। वे सुबह मरे थे। उनकी अंत्‍येष्टि रात्रि 10 बजे तक हुई। मुझे पता लगा कि अस्‍पताल में उनकी मौत उसी दवा से हुई जो नकली थी और जो उनकी फार्मा फैक्‍ट्री में ही बनती थी। इस बात का मुझे पूरा व‍िश्‍वास है कि डॉक्‍टरों को जरूर पता होगा कि यह दवा नकली है। लेकिन वे शायद अपना फर्ज निभाते हुए भूल गये होंगे। हो सकता है कि नर्स या वार्ड बॉय ने गलती कर दी हो। क्‍योंकि गलती का ठीकरा सबसे कमजोर व्‍यक्ति पर ही फोड़ा जाता है। 

खैर, नेताजी अस्‍पताल से घर लाए गए। घर में रोना-धोना शुरू हो गया। जब उनके र‍िश्‍तेदार अर्थी का सामान लेने बाजार गए तो उसने भी तुरंत सामान निकालकर दे दिया। नेताजी को वह अच्‍छी तरह से जानता था। उनके रिश्‍तेदारों ने रौब दिखाकर सामान कम रकम देकर ले लिया। दुकानदार उन्‍हें भी जानता था। इसलिए सभी माल घटिया क्‍वालिटी का दिया। धीरे-धीरे तैयारी पूरी हुई। उन्‍हें उठाने के लिए कई लोग तैयार थे। लेकिन यह काम बेटों को करना होता है इसलिए उन्‍होंने ही किया। श्‍मशान बहुत दूर था इसलिए शव वाहन की व्‍यवस्‍था थी। शव वाहन चालक भी नेताजी से अच्‍छे से परिचित था। इसलिए उसने शव रखवाने से पहले ही पैसे ले लिए थे। पैसे मिलने पर उसके चेहरे पर हल्‍की सी मुस्‍कान आई जो सिर्फ मुझे दिखी। श्‍मशान पहुंचने पर नेताजी को उतारा गया। गाड़ी वाले ने सबसे पहले घर पर फोन लगाया। मैं उसके पास ही खड़ा था। वह पत्‍नी से बोला कि मैं अभी घर आ रहा हूं, तुम गंगाजल निकालकर रखना। आज गाड़ी को शुद्ध करना पड़ेगा। 

नेताजी को शव शैया पर लिटाया गया। इधर लोग बाहर लकड़ी और कंडे वाले से बहस कर रहे थे कि जल्‍दी सामान दो। गिली लकड़ी नहीं देना। लकड़ी सही नहीं दी तो तेरी खैर नहीं। बहुत हरामखोरी करता है। लकड़ी वाला भी नेताजी का सताया हुआ था सो उसने भी अपने मन का किया। मन ही मन उसने प्रवचन दिए। उसके बाद सामान दिया। बारी अब नेताजी के जलने की थी। इत्‍तेफाक से उस दिन दशहरा था। नेताजी की पार्थिव देह सजाई गई। यह काम विशेषज्ञों ने पूरे मनोयोग से किया। जलने से कोई अंग छूट न जाए इसलिए एक बोला- एक लकड़ी यहां भी लगाओ। चिता में अग्नि दी गई। आग बहुत धीरे नेताजी को जला रही थी। सभी लकड़ी वाले को कोस रहे थे। लेकिन मैं चुप था। आग नहीं पकड़ रही थी तो सभी ने कुछ न कुछ प्रयत्‍न किए। बाद में मेरी सलाह पर नेताजी अच्‍छे से जले। उन्‍हें पेट्रोल डालकर जलाया गया। क्‍योंकि मैं जानता था कि नेताजी को पेट्रोल बहुत प्रि‍य था। उन्‍होंने पेट्रोल छिड़ककर ही कई लोगों को जिंदा जलाया था। जहां भी दंगे होते थे वे पेट्रोल बम लेकर सबसे पहले पहुंचते थे। कई आगजनी की घटनाओं में उनका नाम रहता था। आखिरी वक्‍त में सब घर लौट रहे थे। मैं वहीं खड़ा था। हमारे पड़ोसी बोले- आप नहीं चल रहे। मैंने कहा- नहीं आप चल‍िए, मैं पूरा दशहरा देखकर आऊंगा।


Sunday, September 29, 2024

वो बड़ी नाक वाले हैं…


भ्रष्‍टाचार सूंघ लेते हैं, 

हर रास्‍ता ढूंढ लेते हैं,

आंखों को मूंद लेते हैं, 

चालाकी भी गूंद लेते हैं,

झूठों के वे रखवाले हैं, 

वो बड़ी नाक वाले हैं...


झूठी कसमें खाते हैं,

फ‍िर बड़ा इतराते हैं,

गरीबी सा हाल दिखाकर

शीशमहल बनवाते हैं, 

उनके खेल निराले हैं,

वो बड़ी नाक वाले हैं…


लालच में ऐसी मती फ‍िरी,

एक बोतल पर एक फ्री 

दलालों से सरकार घिरी 

उनकी बढ़ती साख गिरी

फ‍िर भी मुगालता पाले हैं

वो बड़ी नाक वाले हैं...


ईमानदारी पर लगा डंक,

जेल जाने का मिला कलंक,

फ‍िर दिखाया अपना रंग

'आतिशी' को दे दी जंग,

सीएम खाली कुर्सी वाले हैं,

वो बड़ी नाक वाले हैं...


 


Friday, May 31, 2024

चुटकी

लक्ष्‍य कोई बड़ा आप बनाओ,
बताकर नहीं, चुपचाप बनाओ,
करो दोस्‍ती, नहीं दुश्‍मनी करो, 
वक्‍त पर गधो को भी बाप बनाओ।

Monday, March 25, 2024

चुटकी

ईमानदारी उनकी तौली है, 
फाइल घोटाले की खोली है, 
बोल रही है अबकी टीम ईडी, 
भाई! बुरा न मानो होली है।।

Tuesday, March 28, 2023

चुटकी

 वह लगता बिल्कुल बेचारा है, 
बताओ क्या विचार तुम्हारा है,
बोलकर कहता है बोलने नहीं देते, 
शायद इसलिए पप्पू कुंवारा है।

चुटकी


अब नहीं करना 'शाउट',
करना न ही कभी डाउट,
संसद से तो हो गई छुट्टी,
बंगले से भी होंगे आउट।

Tuesday, February 28, 2023

चुटकी

शिक्षा और शराब के मेल में,
बड़े-बड़े घोटालों के खेल में,
बेचारी दिल्ली का देखो हाल,
सिसोदिया भी पहुंचे जेल में।

चुटकी

 जबसे हाथ मिलाया है हाथ से,
भटक गए हैं वो अपने पाथ से।
गंवाई इज्जत, तीर कमान भी,
उद्धव जी लगते हैं अनाथ से।।

Wednesday, December 28, 2022

चुटकी

शीत लहर आए या फिर आँधी,
चमचों की दुआएँ सर पे बाँधी,
जयराम ने बताई राज की बात,
मोटी चमड़ी के हैं राहुल गाँधी।

चुटकी

जस्ट चिल-चिल, जस्ट चिल-चिल,
दोनों ने समझा एकदूजे को काबिल,
लंदन की धरा से बोला ललित मोदी, 
सुष्मिता से लग गया है मेरा दिल।

Wednesday, August 31, 2022

कुत्तों का आत्मसम्मान


- सुमित राठौर 
किस्सा आज सुबह का है। हमारा पालतू कुत्ता शेरू कहीं मिल नहीं रहा है। थोड़ी देर पहले तो घर पर ही था। लेकिन बाहर से कुछ भौंकने की आवाजें आने के बाद वह कहीं चला गया था। सोचा अभी आता ही होगा, लेकिन 1 घंटा बीतने के बाद  जब वह नहीं आया ताे चिंता होने लगी। मैंने तुरंत उसे ढूंढने के प्रयास शुरू कर दिए। अपनी कॉलोनी से थोड़ा आगे पहुंचा तो एक पार्क से भौंकने की आवाजें आ रही थीं। मैं पार्क में ही पहुंच गया। वहां देखा तो मैं आश्चर्यचकित था। हमारे शेरू के साथ कुछ 25 से 30 कुत्ते एक गोल घेरा बनाकर बैठै हुए थे। लगा जैसे कोई सभा चल रही थी। करीब आधे घंटे बाद जब  शेरू ने मुझे देखा तो वह तुरंत मेरे पास आया। मैंने उसे पुचकारा और घर चलने के लिए कहा। वह बड़ा चिंतित सा लग रहा था। मुझे भी यह जानना था कि यह सभा किसलिए बुलाई गई थी। शेरू के उठते से ही सभा समाप्त हुई। सभी भौंकते-भौंकते विदा हुए। 
घर चलते-चलते शेरू ने बताया- 
'हम कुत्तों की भी एक एसोसिएशन है। मॉर्निंग डॉग्स एसोसिएशन।'
हमारा एसोसिएशन समय-समय पर कुत्तों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार पर चिंता व्यक्त करता है। आपने पढ़ा ही होगा कि दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम में हमारे एक साथी को सैर कराने पर एक आईएएस दंपति का ट्रांसफर कर दिया गया। पति को लद्दाख तो पत्नी को अरुणाचल प्रदेश भेज दिया गया। हमारे उस साथी को उस दिन घूमने नहीं दिया गया। काफी तनाव में रहा होगा वो। अगले दिन से उस स्टेडियम में भविष्य में अब वह कभी नहीं घूम पाएगा। हम लोगों ने उस कुत्ते के समर्थन में आज सभा बुलाई थी। स्टेडियम में घूमने पर उस बेचारे कुत्ते का क्या दोष। दिल्ली में जो भी हुआ उसे लेकर भी हमारे कई साथियों में आक्रोश है। क्या आपको पता है लद्दाख से अरुणाचल प्रदेश की दूरी 3464 किलोमीटर है। अब वह कहां जाएगा अरुणाचल प्रदेश या लद्दाख, सोचिए जरा....। 
पूरा कुत्ता समाज इस फैसले से बहुत नाराज है। 
शेरू गुर्रराते हुए बोला- 
'हम इतने गए बीते भी नहीं हैं, हमारा भी कुछ आत्मसम्मान है।' 
हमने कई फिल्मों में काम किया है। तेरी मेहरबानियां फिल्म तो याद होगी आपको। कुत्ता किस प्रकार अपनी वफादारी दिखाते हुए अपने मालिक की हत्या का बदला लेता है। 
हम सेनाओं में अपनी सेवाएं देते हैं। 
हमारा एक विशेष डॉग्स क्वॉवड होता है। 
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 1957 में अंतरिक्ष में जाने वाला पहला जानवर भी एक हमारी ही जाति की एक कुतिया लाइका थी। 
अभी हाल ही में अमेरिका के साउथ कैरोलिन में एक पैबल्स नाम के कुत्ते ने सबसे उम्रदराज 22 वर्ष होने का विश्व रिकॉर्ड अपने नाम किया है। उसे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड ने उसे एक प्रमाण पत्र भी दिया है। इंस्टाग्राम पर पैबल्स के मालिक ने उसके नाम से एक अकाउंट भी बना रखा है, जिसमें पैबल्स की हर तरह की एक्टिविटीज की वीडियो और तस्वीरें पोस्ट की जाती हैं। पैबल्स के 5 हजार से ज्यादा फोलोवर्स भी हैं।'
'तमिलनाडु के शिवगंगा में 80 साल के एक बुजुर्ग को अपने पालतू कुत्ते टॉम से इतना लगाव था कि उसके मरने के बाद उस बुजुर्ग ने अपने कुत्ते की याद में मंदिर ही बनवा दिया। 80 हजार रुपये खर्च करके कुत्ते की एक ब्लैक मार्बल की मूर्ति बनवाई। अपने कुत्ते के मंदिर पर वो इंसान आज भी नारियल का प्रसाद और फूलों की माला भी चढ़ाता है।' 
दिल्ली में एक खिलाड़ी की चक्कर में हमारे उस साथी की कितनी तकलीफें बढ़ गई होंगी। 
'शेरू फिर गुर्राया'-   
मैं अपने शेरू की इस कुत्तई के बारे में कभी नहीं जानता था। वह अपने जैसे और कुत्तों के बारे में कितना सोचता है। 
'शेरू ने बात आगे बढ़ाई-' 
आज हमारी एसोसिएशन ने कुछ प्रस्ताव पास किए हैं। 
पहला- कोई भी हमें अपने साथ रखे लेकिन हमें सुबह और शाम प्रतिदिन 1 घण्टे की सैर जरूर कराए। 
दूसरा- हमारे स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखा जाए। 
तीसरा- खाने को लेकर सप्ताह भर में कुछ नया आयटम मिलना चाहिए। कुछ लोग सिर्फ दूध रोटी खिलाकर ही हमें पालते हैं, वो ठीक नहीं है। 
चौथा- हम कही भीं अपनी टांग उठाकर दीवारों, खंबों पर मूत्र विर्सजन आदि कर सकते हैं, हमारे लिए कोई रोक-टोक नहीं होगी। 
पांचवा- हमें वीआईपी ट्रीटमेंट मिलना चाहिए। 
अपने शेरू के विचार सुनकर मैं बहुत प्रभावित था। लेकिन मैंने उसे समझाया कि दिल्ली के स्टेडियम में जो हुआ उसके लिए तो आइएएस दंपति ही दोषी हैं। किसी खिलाड़ी के साथ ऐसा कैसे व्यवहार किया जा सकता है। खिलाड़ी भी देश की शान होते हैं। मैं मानता हूं कि अफसर के कुत्ते का दोष नहीं है लेकिन अफसर को तो कुछ सोचना चाहिए था। अपने कुत्ते को घुमाने के लिए एक एथलीट को रोकना गलत था, जिसकी उन्हें सजा मिली। 
मेरे इतना कहते ही शेरू नाराज हो गया, मुझ पर ही भौंकने लगा- 
लगा जैसे कह रहा हाे कि आप भी न उस खिलाड़ी के पक्ष में बोल रहे हो। 
भौंकते-भौंकते उसने मेरे हाथों से अपनी जंजीर छुड़ाई और तेज भागता हुआ कहीं चला गया। अभी तक नहीं मिल रहा है। 
मैं सोच रहा था कि खिलाड़ी, आइएएस खिरवार दंपति और उनका कुत्ता अगर साथ में टहल लेते तो कितना अच्छा होता। 
सोच रहा हूं कि मैं किसे दोष दूं- खिलाड़ी को, आइएएस अफसर दंपति को, उनके कुत्ते को या फिर गृह मंत्रालय को जिन्होंने ट्रांसफर का आदेश निकाला। 
दोषी कोई भी हो लेकिन मुझे दु:ख इस बात कहा कि इन लोगों के झगड़े में मेरा शेरू नाराज हो गया। 
यह विवाद नहीं होता तो वह मुझसे बिछड़ता तो नहीं……। 
ऐसा लग रहा है जैसे कुत्तों का आत्मसम्मान आदमियों से ज्यादा बढ़ गया है। 
मुझे तो समझ नहीं आ रहा है कि सजा किसे मिली है- आइएएस दंपति को, उस कुत्ते को, मेरे शेरू को या फिर मुझे।  

चमत्कारिक कुर्सियां


बात कुछ दिन पुरानी है। मैं अपने मित्र के साथ दिल्ली में था। हम लोग कुछ काम के सिलसिले में गये थे। सुबह से शाम हो गई लेकिन काम नहीं मिला। इसके बाद शाम को चांदनी चौक पर आ गए। वहां शाम को घूमते हुए अजीबो-गरीब कुर्सियों की एक दुकान हमने देखी। एक दुकानदार कुछ कुर्सियां बेच रहा था। बहुत ही सुंदर-सुंदर कुर्सियां थीं। दुकानदार ने कुछ कुर्सियों पर उनकी विशेषताएं लिख रखी थीं। मैंने देखा एक कुर्सी पर लिखा था- 'इस कुर्सी पर बैठते ही आप झूठ बोलने लगेंगे।' एक के बाद एक झूठ बोलते हुए आप यह साबित करने की कोशिश करेंगे कि आप कट्टर ईमानदार हैं। इसी तरह दूसरी कुर्सी पर लिखा था इस कुर्सी पर बैठते ही आपकी याददाश्त उतने समय तक के लिए जा सकती है, जितना समय आप चाहते हैं। एक कुर्सी पर दंगा करने के विचार आने लगेंगे, ऐसा लिखा था । इन विशेषताओं को देखकर हम बड़े आश्चर्यचकित थे। विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कुर्सियां इतनी चमत्कारी हैं। 

मेरे मित्र ने दुकानदार से सवाल किया कि आपने इन कुर्सियों पर जो लिखा है, वह वैसा काम करती है यह कैसे माना जाए। तो दुकानदार ने मित्र को आमंत्रित किया कि आप दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येन्द्र जैन जी की इस कुर्सी पर बैठकर देखिए। मेरा मित्र जैसे ही उस कुर्सी पर बैठा तो उसे लगा कि उससे सीबीआई और ईडी जैसे अधिकारी सवाल कर रहे हैं। थोड़ी देर बाद उसकी याददाश्त चली गई। उसने मुझे ही पहचानने से इनकार कर दिया। मैंने दुकानदार से निवेदन किया तब उसने मित्र को कुर्सी से उतारा। अब हमें पूरा विश्वास हो गया था कि कुर्सी वाकई में चमत्कारी हैं। हमने सवाल किया कि आपने इन कुर्सियों में चमत्मकारी गुण डाले तो उसका जवाब था कि कुछ नहीं साहब मैंने इन कुर्सियों को बनाते समय इन नेताओं के चित्र दिखा दिए थे। कुर्सियों को बनाते समय मैं इन नेताओं के चरित्र भी बताते जाता था। ऐसा करते-करते इन कुर्सियों ने अपना चमत्कार दिखाना शुरू कर दिया। हमने देखा उसकी दुकान पर अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, संजय सिंह, सत्येन्द्र जैन, पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री विजय सिंगला, सोमनाथ भारती, ताहिर हुसैन, अमानतुल्ला खान जैसे नेताओं के चित्र लगे हुए थे। मेरे मित्र ने सवाल किया आपके पास इनके अलावा कुछ और विशेष कुर्सियां भी हो ताे बताइये। दुकानदार भीतर से दो और कुर्सियां लेकर आया। उसने कहा- यह कुर्सी ले लो साहब! इस पर बैठते से ही आप अपने आपको महाराणा प्रताप का वंशज तक समझने लगेंगे। भरत रत्न मिले ऐसे प्रयास शुरू हो जाएंगे। 

दूसरी कुर्सी दिखाते हुए बोला- यह वाली ले लो! 

आप इस पर बैठकर थूक कर चाट सकते हैं। पहले आप लोगों पर आरोप पर आरोप लगाना। जब आप पर मानहानी केस लगे तो आप बाद में माफी मांग लेना। इस पर बैठकर आप अपनी तुलना प्रधानमंत्री से कर सकते हैं। प्रधानमंत्री बनने के सपने देख सकते हो। सत्ता के स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं। रेवड़ी बांटने का मन करेगा। इस कुर्सी पर बैठकर आपका मन उतरने का नहीं करेगा। फैविकोल जैसे चिपक जाओगे साहब! 

हम इतनी चमत्कारी कुर्सियां देखकर हम दंग थे। हमें लगा कि इन कुर्सियों में कुछ न कुछ तो गड़बड़ है। 

मेरे मित्र ने सवाल किया कि आपने कोई ऐसी कुर्सी नहीं बनाई जिस पर बैठकर सच बोला जा सके, जिस पर बैठकर महंगाई, बेरोजगारी, कुपोषण, हिंसा, भेदभाव, धार्मिक कट्टरता, आतंकवाद, अशिक्षा, महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार, भुखमरी, रोटी, कपड़ा, मकान जैसी समस्याएं समाप्त की जा सकें। 

इस पर दुकानदार मायूस होकर बोला- साहब! 75 साल से मैं ऐसी ही कुर्सी बनाने की कोशिश आज तक कर रहा हूं लेकिन अभी तक बना नहीं पाया।