Tuesday, June 19, 2012

नए भारत की नई तस्वीर


            बच्चे बड़े भोले होते हैं। हमारे पड़ोस में रहने वाला पिंकू भी बहुत भोला है। सिर्फ 12 साल का ही तो है। सुबह घर आया था। पिंकू को अभी से ही अपने भविष्य की चिंता होने लगी है। मेरे पास आया, मुझसे कहता है कि अंकल 'मैं बड़ा होकर टूरिस्ट गाइड बनना चाहता हूं।' तब मैंने कहा- 'टूरिस्ट गाइड तो वैसे ही देश में बहुत हैं, जब तू बड़ा होगा तो न जाने कितने हो जाएंगे।' इतने तो देश में पर्यटन स्थल नहीं रह जाएंगे जितने की टूरिस्ट गाइड हो जाएंगे।
     'हां! आपने ठीक कहा, लेकिन मैं फिर भी कुछ अलग स्थल पर्यटकों को दिखाऊंगा। मैंने इसकी तैयारी भी शुरू कर दी है।'
        मैं भी जानता हूं कि पिंकू बड़ा जिद्दी है। अपनी तैयारी की फाइल दिखाते हुए बोला-'यह देखो अंकल मेरे पर्यटन स्थल।'  बाकई में उसके पर्यटन स्थल देखकर मैं भी आश्चर्यचकित था। पिंकू ने पहला पन्ना दिखाते हुए बोला- 'देखो अंकल यह योजना आयोग का दफ्तर है। इस दफ्तर में पर्यटकों को 35 लाख रूपए की लागत से बना हुआ टॉयलेट दिखाया जा सकता है। इसको दिखाने से हमारे देश की साख बढ़ेगी। क्योंकि जब हम 35 लाख रूपए का सिर्फ टॉयलेट बनवा सकते हैं तो फिर अन्य सुविधाओं पर कितना खर्च करते होंगे सोच सकते हैं।'
          इसके बाद यह देखो दिल्ली का रामलीला मैदान। यह वह स्थान है जहां पर कुछ साल पहले कालाधन धन भारत लाने की मांग करने वाले एक देशभक्त बाबा को दिल्ली पुलिस ने बुरी तरह से पीटा था।यही वह स्थान है जहां दिल्ली पुलिस ने जलियांवाला बाग का दृश्य निर्मित किया था। दिल्ली पुलिस जनरल डायर बन गई थी।
इसके बाद यह देखो केन्द्रीय दूरसंचार, कोयला और खेल मंत्रालय। यहां पर्यटकों को बताऊंगा कि यही वह स्थान है जहां पर 2-जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमण्डल और कोयला आवंटन जैसे बड़े-बड़े घोटाले हुए। इसी प्रकार यह देखो राष्ट्रपति भवन। राष्ट्रपति भवन के बारे में बताया जाता है कि यहां देश के प्रथम नागरिक निवास करते हैं। लेकिन इस प्रथम नागरिक को यहां तक पहुंचने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं यह वही जानता है। प्रथम नागरिक बनने के लिए द्वितीय और तृतीय स्तर के नेताओं से जोड़-तोड़ तक करनी पड़ती है। यहां राष्ट्रपति अपनी यात्राओं पर 200 करोड़ रुपए तक खर्च कर देते हैं।
          इसके बाद यह देखिए लखनऊ और मुम्बई। लखनऊ में मायावती के हाथी पार्क। करोड़ों रुपए के हाथी पार्क को घुमने और घुमाने में बड़ा ही आनंद आएगा। ये मुम्बई में आर्थर रोड की जेल। यह भी घुमाऊंगा।
           यही वह जेल है जहां पर मुम्बई पर आतंकी कहर बरपाने वाला आतंकवादी अजमल आमीर कसाब सालों तक हमारे देश में पूरे ठाठ से रखा गया। जब तक हम उसे फांसी दे पाते बिचारा बूढ़ा होकर मर गया।
वाकई में यार पिंकू...! हमारे देश में तो यह भी देखने लायक स्थल हो सकते हैं मैंने तो सोचा ही नहीं था। 'अरे अंकल! ये तो कुछ भी नहीं है अभी तो और भी कुछ देखना बाकी है। नए भारत की नई तस्वीर तो और भी जबर्दस्त होगी...।'

Wednesday, June 13, 2012

बहू सुपुत्री तो का धन संचय

       
   आजकल सासों की सांसें फूल रही हैं। हां! बहुओं की तरक्की किससे देखी जाती है। आश्चर्य हो रहा है कि चौपालों पर, घर की देहरी पर, मंदिर में, क्लब में, उद्यानों में, सत्संगों में, सभी जगह सासों ने बहुओं की बुराई करना भी बंद कर दिया है। सोच भी बदलने लगी है। बहू रोज-रोज बाजार की दौड़ लगाएगी। महंगे-महंगे कपड़े पहनेगी, जेवर बनवाएगी। बहू आएगी तो खर्चे बढ़ जाएंगे। बहू आएगी तो सब अपने आप संभाल लेगी। घर को भी, देश को भी। भगवान से भी एक ही अर्जी लगाई है कि बहू दे तो 'डिंपल' जैसी सिंपल देना। हां क्या पता कब बहू की किस्मत चमक जाए, वह संसद में दिखाई दे। बहू सिंपल होने के साथ-साथ राजनीति में भी थोड़ी रूचि रखती हो। रूचि नहीं भी हो तो चल जाएगा। हम उसे राजनीति समझा देंगे। जनता से वादे ही तो करना है। चुनाव के समय जनता से बीच जाना है। उनके बच्चों को अपने बच्चों की तरह गोदी में उठाकर मम्मी पापा से वोट मांगने की गुजारिश करना है। एक आध गरीब की झोपड़ी में खाना खाने से जीत पक्की समझो। बहू एक बार चुनाव हार भी जाएं तो कोई बात नहीं, दूसरी बार भी आजमा कर देख लेंगे। आज नहीं तो कल जीतेगी ही। एक बार जीत गई तो समझो फिर तो इतिहास बन गया  पूरे घर का। सभी काम नेतागिरी से हो जाएंगे। बेटों और रिश्तेदारों सभी को कहीं न कहीं फिट करा ही देंगे। सच में आजकल राजनीति से अच्छा कुछ नहीं है। मोहल्ले वालों के मुंह भी बंद हो जाएंगे। सबकी सब आगे पीछे घूमेंगे हमारे। जो काम चाहेंगे वह हो जाएगा। अब तो जमाने के ताने का भी डर खत्म हो गया है। जमाना चाहे कुछ भी कहता रहे कि बहू की कमाई की खाएंगे। इसमें कौन सा पाप करेंगे, खा लेंगे। कोई बुराई थोड़ी ही है। बहू काबलियत पर झण्डे गाढ़ेगी। काबिल बनाने वालों को भी कुछ मिलेगा कि नहीं। लोग तो कुछ भी कहते रहेंगे, उनके कहने पर तो घर नहीं चलेगा न। घर तो हमें ही चलाना है। चलाएंगे भी, चुनाव भी लड़ाएंगे। अगर सास का सुख लिखा होगा तो बहू एक न एक दिन चुनाव जरूर जीतेगी। इसके लिए ससुरों ने भी तैयारी कर ली है। अपने दिमाग पर तनाव लेना कम कर दिया है। दिल कठोर की जगह मुलायम हो गया है। मुलायम दिल से मीठी-मीठी बातें बहुओं के लिए अपने आप निकलने लगी हैं। जमाना बदल गया है। बहू के जीतने पर पूरा शहर खुशी से नाच उठेगा। एक दिन देखना यह सुख आएगा भी। अब तो लगने लगा है कि बहू ही हमारा सुनहरा भविष्य संवारेगी। बहू सेवा नहीं करे तो क्या हुआ मेवा तो खिलवाएगी। सोच के साथ-साथ मुहावरे भी बदलने लगे हैं। 'बहू सुपुत्री तो का धन संचय, बहू कुपुत्री तो का धन संचय'। इसलिए हमने भी धन संचय करना भी छोड़ दिया है।

Tuesday, June 5, 2012

तुम क्या जानो पेट्रोल की कीमत!


        भारत बहुत तरक्की कर रहा है। तरक्की हर क्षेत्र में हो रही है। फिर वह चाहे पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि का मामला ही क्यों न हो!! खाना, रहना, चलना, दौडऩा, पढऩा हर क्षेत्र में हम ऊंचाई की ओर बढ़ रहे हैं। हमारी सरकार ने जिस प्रकार से साल दर साल पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए हैं वह भारत के लोगों की तरक्की की ओर ही तो इशारा करते हैं। यह तरक्की नहीं तो और क्या है कि हम पहले 44 रुपए प्रति लीटर पेट्रोल फूंकने में सक्षम थे और आज लगभग 80 रुपए प्रति लीटर फूंकने में भी उतने ही सक्षम हैं। जिस प्रकार पेट्रोल की कीमतें बढ़ रही हैं उससे भविष्य कैसा होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। सबसे पहले बात शिक्षा से शुरू करते हैं। स्कूल की कीताबों में गणित के जो सवाल रहेंगे उनमें कुछ पेट्रोल से संबंधित भी रह सकते हैं। प्रश्न होगा कि 3 साल में सरकार ने 16 बार दाम बढ़ाकर 44 रुपए के पेट्रोल को 80 रुपए में बेचा तो अगले 10 साल में पेट्रोल की कीमत क्या होगी? दूसरा सवाल यह भी पूछा जा सकता है कि एक पेट्रोल कंपनी के मालिक ने नुकसान का ढोल पीटकर एक साल में दस करोड़ रुपए कमाए तो वह 5 साल में कितने रुपए कमाएगा? हिन्दी विषय में विद्यार्थियों से निबंध लिखने को भी कहा जा सकता है। इसका विषय 'पेट्रोल-डीजल के फायदे नुकसान पर अपने विचार व्यक्त कीजिए', भी हो सकता है। स्कूल में पढ़ाने वाले मास्टर जी बच्चों को ट्यूशन पढक़ार उनसे फीस के रूप में रुपए न लेकर पेट्रोल मंगाया करेंगे। अब फिल्मी दुनिया में आते हैं। फिल्मों में संवाद भी कुछ अलग तरीके से खिले एवं बोले जाएंगे। फिल्मों में एक नायक-दूसरे नायक से जब यह सवाल करेगा कि मेरे पास गाड़ी, बंगला है और तुम्हारे पास क्या है? तो दूसरा नायक कहेगा 'मेरे पास पेट्रोल है'!! फिल्म ओम शांति ओम की तरह एक संवाद जिसमें नायिका-नायक से कहेगी कि-एक बूँद पेट्रोल की कीमत तुम क्या जानो चुन्नी बाबू...। नकारात्मक भूमिका निभाने वाले कलाकारों को बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में दिखाने की घोड़ों पर दौड़ता हुआ फिल्माया जाएगा। शादी जैसे सामाजिक कार्य में भी पेट्रोल बड़ा अहम भूमिका अदा करेगा। दहेज लेने की परंपरा तो बंद नहीं होगी, वर पक्ष-वधु पक्ष से यह मांग एक और बढ़ा देगा कि मेरे बेटे को चार पहिए की गाड़ी तो चाहिए ही, साथ ही 100 लीटर पेट्रोल भी देना होगा। इतना ही नहीं बारातियों का स्वागत भी कम से कम 5 लीटर पेट्रोल देकर किया जाए। पेट्रोल देने के बाद ही बात आगे बढ़ेगी। हां! भ्रष्टाचार में भी पेट्रोल के लेन-देन का इस्तेमाल किया जा सकता है। नोट नहीं बल्कि पेट्रोल का इस्तेमाल किया जाएगा। किसी भी सरकारी कार्यालय का बाबू काम करने के बदले में रिश्वत तो लेगा लेकिन वह पेट्रोल के रूप में होगी। बाबू या अधिकारी संबंधित व्यक्ति को स्कूटर या मोटरसाइकिल की चाबी देते हुए बड़े निवेदन के साथ कहेंगे-कृपया इसमें पांच लीटर पेट्रोल डलवा दीजिए आपका काम हो जाएगा। रिश्वत देने वाला व्यक्ति स्वयं इस बात के प्रलोभन देगा कि साहब! आप मेरा यह एक छोटा सा काम करा दें तो मैं आपकी गाड़ी का टेंक फुल करा दूंगा। न जाने क्या-क्या उपयोग करेंगे लोग पेट्रोल का। चुनाव के समय जिंदाबाद, मुर्दाबाद के नारे लगाने वाले लोगों को पेट्रोल का लालच देकर बुलाया जाएगा। पूरे देश में पेट्रोल की अहमियत पहचानी जाएगी। पेट्रोल परेशानी नहीं बल्कि हर समस्या का समाधान होगा। लेकिन समस्या यह है कि लोग पेट्रोल की मूल्य वृद्धि को तरक्की मान ही नहीं रहे हैं। गरीबी रेखा की नई परिभाषा के हिसाब से भी देखा जाए तो गाड़ी चलाना वाला हर व्यक्ति अमीर है, क्योंकि वह 80 रुपए का पेट्रोल भरवा सकता है तो एक दिन में कितने कमाता होगा समझा जा सकता है। गरीबी रेखा में तो 32 रुपए शहर में और 26  रुपए गांव में प्रतिदिन कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। तो भाई साहब! आप खुद सोच सकते हो कि आप कीतने अमीर हो गए हैं! इसलिए देश तरक्की कर रहा है...इसे तरक्की करने दें!!

Wednesday, May 30, 2012

'मन' मोहने वाले अर्थशास्त्री


                 देशवासी भले ही प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्री होने पर शक करते हो, लेकिन मैं नहीं करता। सबसे बड़ा और समझदार अर्थशास्त्री वही है जो अपनी कंपनी को घाटा पहुंचाए बिना सभी को संतुष्ट करते चलता है। जब से मनमोहन सिंह ने कांग्रेस कंपनी संभाली है तब से देखो न कंपनी कितने फायदे में चल रही है। काफी उठापठक के बाद भी यह कंपनी देश चला रही है।
               वैसे इस कंपनी को संभालने वाले कई आए और गए लेकिन हमारे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कंपनी पूरी दुनिया में छा गई। हां! कई बार भारतीय जनता पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, अण्णा डीएमके, टीम अण्णा, योग गुरू बाबा रामदेव और जनता दल के सुब्रहण्यम स्वामी जैसी प्रतिद्वंदी कंपनियों ने कांग्रेस कंपनी को काफी नुकसान पहुंचाने की कोशिश की लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। हमारे प्रधानमंत्री का अर्थशास्त्र तो इतना बढिय़ा है कि उन्होंने तेल, कोयला, दूरसंचार, दवा जैसी किसी भी कंपनी को घाटा नहीं उठाने दिया। तेल कंपनियों ने जब भी नुकसान का शोर मचाया उन्होंने तुरंत दाम बढ़ा दिए। चाहे भले ही जनता को दिक्कत हुई हो। तीन साल में 16  बार दाम बढ़ाकर यही तो किया है। गरीब किसान कर्ज के बोझ तले भले ही आत्महत्या कर रहे हों लेकिन शराब कारोबारी विजय माल्या को कभी भी घाटा नहीं होने दिया।
                यह हमारे प्रधानमंत्री का अर्थशास्त्र ही तो था जिसमें उन्होंने विजय माल्या की किंगफिशर एयर लाइन को घाटे से उबारने के लिए तीन हजार करोड़ रुपए का कर्ज दिया। यह हमारे प्रधानमंत्री का अर्थशास्त्र ही तो है जिसमें उन्होंने रिलायंस तेल कंपनी के मालिक मुकेश अंबानी का दुनिया में सबसे महंगा आशियाना बनवाने में मदद की। अगर मुकेश अंबानी घाटे में होते तो क्या ऐसा संभव था कि अरबों रुपए का महल तैयार हो पाता। अब बात इस कंपनी के कर्मचारियों की करते हैं।
               यह प्रधानमंत्री का ही अर्थशास्त्र है जिसमें उन्होंने अपने मंत्रियों को आपस में मिल बांटकर भ्रष्टाचार करने की शक्ति प्रदान की। अब तो टीम अण्णा ने भी पूरी दुनिया में बता दिया कि इस कंपनी के 15 मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। पी. चिदंबरम, कपिल सिब्बल, कमलनाथ, सलमान खुर्शीद, प्रणब मुखर्जी जैसे कर्मचारियों ने किस प्रकार अपने-अपने कार्यकाल में अपने-अपने विभाग में भ्रष्टाचार किया यह भी सभी बता दिया है। 2-जी स्पेक्ट्रम आंबटन घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल जैसे घोटालों की मदद से किसी को भी निराश नहीं किया, यह भी हमारे प्रधानमंत्री की ही अर्थशास्त्र है। घोटाले के आरोप में इन्हीं की कंपनी के एक कर्मचारी सुरेश कलमाड़ी गिरफ्तार हुए तो उन्होंने एक दूसरे मंत्री ए. राजा को भी जेल भेज दिया। ए. राजा भी कहीं नाराज न हो जाएं इसलिए उन्होंने कनिमोझी को भी जेल भिजवा दिया था।
              भले ही हमारे देश में रुपए का संकट चल रहा है, देश की प्रतिष्ठा दांव पर है, महंगाई से आम आदमी दम तोड़ रहा है लेकिन अपनी म्यांमार की यात्रा में 50 अरब डॉलर की सहायता देना भी अर्थशास्त्र ही तो है। पहले निवेश करना, फिर कमाना। यह हमारे प्रधानमंत्री का अर्थशास्त्र ही तो है जिसके कारण उन्होंने कंपनी की मालकिन सोनिया गांधी के दिमाग पर जादू कर दिया है। मालकिन जो कहती हैं वही करते हैं। यही तो एक अच्छे अर्थशास्त्री की निशानी है। इसलिए हमारे प्रधानमंत्री के बारे में भले ही कोई कुछ भी कहे लेकिन देशवासियों को 'मन' मोहने वाला अर्थशास्त्री दूसरा कभी मिलने वाला नहीं है।

Friday, May 25, 2012

आओ पिता का पता लगाएं


    भारत बड़ा अजीब देश है। अजीब इसलिए क्योंकि यहां काफी कुछ अजीब घटित होता है। बात-बात में बात पुलिस तक पहुंच जाती है, कभी-कभी तो न्यायालय तक भी। छोटी-छोटी बातों के लिए न्यायालयों को परेशान किया जाता है। दुकान खाली नहीं हो रही, चैक बाउंस हो गया, दुर्घटना का क्लेम लेना है, मकान मालिक से किरायेदार का झगड़ा, मिया-बीबी का झगड़ा जैसी छोटी-छोटी बातों के लिए उच्च न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय तक के चक्कर कट जाते हैं। न्यायालय के पास वैसे ही काम बहुत है, अब एक नया मामला सुलझाना है। यहां रामसेतु को बचाने, कालेधन को वापस लाने की बात हो रही है ऐसे में पुत्र के पिता का पता लगाना अजीब ही तो है। न्यायालय भी क्या करे, मामला आया है तो निपटाना तो पड़ेगा ही। शायद इसलिए ही पिछले 2 साल से यही पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि उत्तरखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री और आंध्रप्रदेश के पूर्व राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी ही रोहित शेखर के असली पिता हैं या नकली। बड़ा अजीब मामला है। हम 2 वर्षों से यही पता नहीं लगा पा  रहे हैं कि तिवारी ही रोहित के पिता हैं क्या? शायद भारत ही दुनिया में एकमात्र ऐसा देश होगा जहां कौन किसका पिता है इस बात पर न्यायालय फैसला करता है। पहले पॉलीग्राफ टेस्ट, फिर डीएनए टेस्ट। जब डीएनए टेस्ट के लिए खून का नमूना देने के लिए मना करे तो पुलिस द्वारा जबरदस्ती खून निकालने का फैसला। यह तो हमें भगवान को शुक्रिया अदा करना चाहिए कि रोहित की तरह किसी और लडक़े को ऐसी सद्बुद्धि नहीं दी। सोचो देश की 121 करोड़ की आबादी है, अगर इस आबादी में से केवल 5-10 हजार लावारिस लडक़े किसी पर भी पिता होने की ओर इशारा कर देते तो पिता का पता लगाने में न्यायालय की क्या हालत हो जाती! न्यायालय का पूरा समय तो यही पता लगाने में बीत जाता कि रामू के पिता कौन है और मोहन के कौन? आए दिन पिता का पता लगाने का मामला चलता। पुलिस भी शांति व्यवस्था को छोडक़र जगह-जगह खून के नमूने लेने के लिए दौड़ भाग करती नजर आती। चैनल वाले भी चकरघिन्नी हो जाते। कभी मुम्बई में सुनवाई होती तो कभी दिल्ली में। ऐसा लगता है कि या तो रोहित का दिमाग राकेश रोशन की फिल्म 'कोई मिल गया' के रोहित (ऋतिक रोशन) की तरह कमजोर है, या फिर इस कलयुग में रोहित श्रवण कुमार बनने की कोशिश कर रहे हैं। माता उज्ज्वल शर्मा तो हैं ही, बस पिता की टोकरी खाली है। न्यायालय का फैसला आ जाए तो वह भी भर जाएगी। दोनों को तीर्थयात्रा कराना होगी शायद रोहित को। इस श्रवण कुमार के बारे में श्रवण करते-करते न जाने कितने लोगों के कान पक चुके हैं। ऐसा लगता है कि वाकई में रोहित का दिमाग कमजोर है, क्योंकि ऐसा नहीं है तो उन्हें पहले ही न्यायालय की शरण में आ जाना चाहिए था। 86 वर्ष के तिवारी को बार-बार न्यायालय के चक्कर लगवाना अच्छी बात नहीं है। खुद 31 साल के रोहित यदि पहले ही न्यायालय पहुंच जाते तो मामला कभी का निपट गया होता। बड़ी अजीब स्थिति है, न्यायालय ने तिवारी का खून लेने का पुलिस द्वारा जबदस्ती खून निकलवाने की बात कही है। ऐसा लगता है कि तिवारी खून का नमूना न देकर अपनी जगह सही हैं। क्योंकि सोचने वाली बात यह है कि जिस व्यक्ति की पूरे देश में बदनामी हो चुकी हो, 86 वर्ष की उम्र में तीर्थ स्थानों की जगह न्यायालय के चक्कर लगाने पड़ रहे हो, अखबारों की सुखिर्यों और समाचार चैनलों में बार-बार नाम उछाला जा रहा हो, जिस व्यक्ति का जमीर मर चुका हो ऐसे व्यक्ति के शरीर में शायद ही खून की एक बूंद भी निकले। न्यायालय को पिता का पता लगाने के लिए कोई दूसरी तरकीब सोचनी चाहिए। इस बात पर पहले ही ध्यान दे देते तो 2 साल का समय बर्बाद न होता। खैर अभी भी देर नहीं हुई है। पिता का पता लगाने के लिए दूसरी विधि क्या हो सकती है इस विषय पर चिंतन करना चाहिए। आओ चिंतन करते हैं और पता करते हैं!!

Wednesday, May 16, 2012

हमारी प्यारी बूढ़ी संसद

          
           जानते हैं बुढ़ापे की खास बात क्या होती है। वह खास बात यह है कि बुढ़ापा एक बार आता है तो आते ही चला जाता है। दूसरी खास बात यह भी है कि व्यक्ति बूढ़ा होने पर कभी भी अपनी बुराई को सुन नहीं सकता। भले ही वह दिनभर दूसरों की बुराई करता रहे। ठीक इसी तरह हमारी संसद भी बुढ़ापे में प्रवेश कर गई है। संसद की 60वीं सालगिरह बड़े धूमधाम से सांसदों द्वारा मनाई गई। एक बात समझ नहीं आई कि हमने 59 वर्ष कब बिता दिए पता ही नहीं चला। लगता है सरकार ने सोचा होगा कि संसद की वर्षगांठ के जश्न में जनता का ध्यान इस बात से हटाया जाए कि हमारी कितनी किरकिरी हुई है। सभी सांसदों ने भारतीय लोकतंत्र की न सिर्फ बढ़ाई की बल्कि इसे दुनिया में सबसे बेहतर भी बताया। हां! सही बात है, भारत में लोकतंत्र है। यहां नक्सली अपनी बात मनवाने के लिए जिलाधीश, विधायक तक का अपहरण कर लेते हैं। कभी-कभी तो हमारे जवानों को ही मौत के घाट उतार देते हैं। हां! भारत में लोकतंत्र है। यहां घोटाले का पैसा नीचे से लेकर ऊपर तक बंटता है। अब देखो न 2जी स्पेक्ट्रम के आबंटन में हुए घोटाले में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा, कनिमोझी और बड़ी-बड़ी दूरसंचार कंपनियों के अधिकारी जेल की हवा खा चुके हैं। हमारे यहां लोकतंत्र है, वह इस बात से भी साबित होता है कि हमने उत्तरप्रदेश के सबसे बड़े माफिया राजा भैया को ही उनके अनुभव के आधार पर जेल मंत्री बनाया। हमारे यहां राजनीति करने वाले राजद सांसद राजनीति प्रसाद राज्यसभा में लोकपाल बिल को ऐसे फाड़े देते हैं जैसे उनसे किसी ने उनकी जायदाद मांग ली हो। हम आतंकवाद को समाप्त करने के लिए अमेरिका में बड़े बोल बोलते हैं और यहां संसद पर हमला करने वाले मोहम्मद अफजल गुरु और मुम्बई पर हमला करने वाले कसाब को देशभक्तों की तरह पालते हैं। यहां सांसदों को खरीदा जाता है। भ्रष्टाचार समाप्त करने वालों को पीटा जाता है और जो राष्ट्रमंडल खेल के नाम पर बड़े खेल कर चुके कुछ लोगों को अपने नजदीक बिठाकर उनकी पीठ थपथपाई जाती है। संसद भी बूढ़ी हो चुकी है। इसे भी अपनी बुराई स्वीकार नहीं। अब देखो न बुढ़ापे की तरह संसद की गरिमा, सुरक्षा, कार्यप्रणाली जो एक बार बिगड़ी तो लगातार बिगड़ती चली जा रही है। यहां पहले कभी एक अपराधी घुसा होगा और बिल्कुल बुढ़ापे की तरह अपराधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अब यहां 163 सांसद हत्या, लूट, डकैती जैसे मामलों से जूझ रहे हैं, जिनकी जांच चल रही है। लेकिन कुछ भी कहो जिस प्रकार घर में बुजुर्ग व्यक्ति सबसे प्यारे होते हैं, उसी प्रकार हमारी भी बूढ़ी संसद बड़ी प्यारी है। बेचारी संसद, बूढ़ी संसद!!

Wednesday, May 9, 2012

अब बचेगा देश!



          क्रिकेटरों को सांसद बनना एक अच्छी शुरुआत है। जिस प्रकार संसद का कायाकल्प हो रहा है उसे देखकर ऐसा लगता है कि आने वाले कुछ सालों में संसद दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में लगेगी। क्रिकेटरों को सांसद बनाया जा रहा है और सांसदों को क्रिकेटर।
            क्रिकेटर और नेता जितनी तेजी से एक दूसरे के क्रियाकलापों को जितनी तेजी से बदल रहे हैं यदि इसी प्रकार से चलता रहा तो देश के सभी क्रिकेट स्टेडियम विधानसभाओं में बदल जाएंगे। विधानसभाओं में क्रिकेट के मैच हुआ करेंगे। अब देखो मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने राज्यसभा का सांसद बनने के लिए अपनी स्वीकृति दे दी है। सुना है उन्हें 103 नम्बर की सीट भी मिल गई है। इससे पहले भी क्रिकेट की दुनिया से संबंध रखने वाले नवजोत सिंह सिद्दु, मोहम्मद अजहररुद्दीन और कीर्ति आजाद जैसे क्रिकेटर संसद की दहलीज पर पहुंच चुके हैं। ये सभी कभी संसद भवन में दिखाई देते हैं तो कभी टीव्ही चैनलों पर क्रिकेट की कमियां बताते रहते हैं।
            नेताओं में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार सांसद रहते हुए क्रिकेट की पिच तक पहुंच चुके हैं। उन्हें क्रिकेट इतना पसंद आता है कि उन्हें भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) का अध्यक्ष बनाया गया है। इसके अलावा वे अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट कांउसिल के भी अध्यक्ष हैं। इसी प्रकार पत्रकार से सांसद बने राजीव शुक्ला भी बीसीसीआई के उपाध्यक्ष और आईपीएल टूर्नामेंट के कमिश्नर हैं। पूर्व मंत्री शशि थरूर को भी क्रिकेट का काफी शोक था और उन्होंने अपनी महिला मित्र के साथ आईपीएल की एक टीम भी तैयार की थी। इसी प्रकार ललित मोदी ने भी क्रिकेट के नए स्वरूप आईपीएल की शुरुआत की। सुरेश कलमाड़ी भी राष्ट्र मण्डल खेलों में बड़ा खेल कर चुके हैं।
           यदि कामकाज के बदलाव का यह खेल ऐसे ही चलता रहा तो हो सकता है कि एक दिन क्रिकेटर गांधी टोपी में दिखाई देंगे और नेता आईपीएल में मिलने वाली ओरेंज केप में। जरा सोचिए कितना मजा आएगा  जब चोरी-छुपे बिकने वाले नेताओं की खुलेआम बोलियां लगेंगी। अगर ऐसा हो गया तो कितना बढिय़ा होगा। क्योंकि देश में 1 लाख 76  हजार करोड़ वाला टू-जी स्पेटक्ट्रम घोटाला और 10 लाख करोड़ कोयला आवंटन घोटाला निलामी नहीं होने के कारण ही हुआ है। यदि निलामी हो गई होती तो सब कुछ ठीक रहता। ऐसा लग रहा है अब देश में कुछ स्थितियां ठीक हो रही हैं। नेताओं की निलामी होगी और क्रिकेटर संसद चलाएंगे तो घोटाले सुनने को नहीं मिलेंगे। क्रिकेटर एक-दूसरे पर कुर्सियां भी नहीं फेंकेंगे, कोई बिल नहीं फाडेंगे, लोकसभा की आसंदी को भी नहीं घेरेंगे, माइक भी नहीं तोड़ेंगे। अब लगता है देश बच जाएगा!!

Wednesday, May 2, 2012

आत्मा भी नीलाम होना चाहती है, खरीदोगे क्या!


            जीवन में ज्यादा दौड़ भाग नहीं करनी चाहिए। क्या करना है दौड़ भाग करके? कुछ लोग सोचते हैं कि अभी दौड़ भाग करने से बुढ़ापा शांति से कट जाएगा। लेकिन ऐसा सही नहीं है। बुढ़ापा शांति में काटने की सोचने वाले दरअसल गलत सोचते हैं। अब मोहनदास करमचंद को ही लो। मोहनदास करमचंद मतलब महात्मा गांधी...! महात्मा गांधी ने भी काफी दौड़ भाग की। नंगे बदन न जाने कहां-कहां नहीं गए। यह सोचकर कि देश जब आजाद हो जाएगा तो आने वाली पीढ़ी मुझे याद रखेगी। उन्हें भी नहीं पता था कि लंदन में उनकी स्मृति से जुड़ी जब कुछ वस्तुओं को नीलाम करने की नौबत आएगी तब हमारी सरकार के पास केवल 81 लाख रुपए भी नहीं होंगे। उन्हें क्या पता था कि लंदन में उनकी हत्या के समय वहां से उठाई गई घास और मिट्टी आठ लाख रुपए में, चश्मा 27 लाख रुपए और चरखा 22 लाख रुपए में नीलाम होगा और हमारी सरकार चुपचाप तमाशा देखती रहेगी।
         देशवासियों को चिंता करने की बात है कि हमारा देश इतना गरीब हो गया कि हमारे पास 81 लाख रुपए भी नहीं हैं! क्योंकि 81 लाख रुपए होते तो क्या हम बापू की स्मृतियां नहीं खरीद लेते? अब ये बात अलग है कि हम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल की यात्रा में 205 करोड़ खर्च कर सकते हैं, कसाब की सुरक्षा में 30 करोड़ से ज्यादा लुटा सकते हैं, शराब कारोबारी विजय माल्या को 3000 करोड़ की आर्थिक सहायता दे सकते हैं, विश्वकप जीतने वाले क्रिकेट खिलाडिय़ों को 1-1 करोड़ खुशी में दे सकते हैं, विश्व के सबसे अमीर लोगों में शामिल मुकेश अंबानी 50 अरब रुपए का अपना घर बनवा सकते हैं, शाहरुख खान और ऋतिक रोशन 4.5 करोड़ सिर्फ टैक्स में ही दे सकते हैं, अफगानिस्तान को 50 करोड़ की आर्थिक सहायता दे सकते हैं। यह बात भी अलग है कि हमारे देश के लगभग 800 सांसद हर साल 4000 करोड़ की राशि विकास कार्यों के लिए खर्च करते हैं। सांसद विकास के लिए इतने गंभीर रहते हैं कि उन्हें नीलामी जैसे काम के लिए 81 लाख रुपए खर्च करना फालतू लगता है।
       आज हमारा देश आर्थिक रूप के अलावा भी और कई मामलों में गरीब हो गया है। हम नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैचारिक व धार्मिक जैसे कई मामलों में गरीब हो गए हैं! हम इतने गरीब हो गए हैं कि अपने महापुरुषों को ही भूल गए हैं! अब इस गरीबी में क्या दौड़ भाग करें। बहुत गरीबी छा गई है इस देश में। सरकार के पास 81 लाख रुपए नहीं थे तो सरकार को विश्व बैंक से लोन लेना चाहिए था!
        महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्स्टाइन ने सही ही कहा था कि आने वाली पीढ़ी इस बात पर विश्वास नहीं करेगी कि गांधी नाम का एक हाड़-मांस का इन्सान इस धरती पर जन्मा था। सरकार भी उन्हें भूल चुकी है। कल ही बापू मेरे सपने आए थे। कह रहे थे कि मेरे आदर्श, मेरे सिद्धांत, चश्मा, चरखा सबकुछ तो नीलाम हो चुका है अब आत्मा ही बची है। आत्मा भी नीलाम होना चाहती है, सरकार के पास इसके भी दाम हैं या फिर मुझे इसे भी विदेश में बिकवाना होगा! हो सके तो मुझे जल्दी सूचना देना, क्योंकि मेरे पास समय बहुत कम है....।




Wednesday, April 25, 2012

कोर कमेटी है या 'चोर कमेटी'


   चोर कई तरह के होते हैं। जैसे चप्पल चोर, पर्स चोर, आभूषण चोर आदि। सब चोरी करते हैं। इनके चोरी करने के तरीके भी अलग-अलग होते हैं। लेकिन कुछ चोर अलग किस्म के होते हैं। बिल्कुल टीम अण्णा से निकाले गए मुफ्ती शमीम काजमी और स्वामी अग्निवेश की तरह। ये ऐसे चोर होते हैं जो हमारे जज्बातों, बयानों और हमारी योजनाओं की चोरी करते हैं। स्वामी अग्निवेश ने भी जनता की भावनाओं को चोरी कर सरकार को सारी बात बताई और आन्दोलन कमजोर किया। कुछ ऐसा ही मुफ्ती शमीम काजमी कोर कमेटी की बैठक में मोबाइल से रिकार्डिंग कर कर रहे थे। काजमी, अग्निवेश बातें चोर हैं! जो बातें चुराकर दूसरों को बेचते थे!
    चोर कोई भी हो, वह जब भी पकड़ा जाता है, हमेशा यही कहता है कि मैंने चोरी नहीं की। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार काजमी ने कहा कि मोबाइल में रिकार्डिंग का बटन धोखे से दब गया होगा। उन्हें रिकार्डिंग करना आती नहीं। भले ही उनके मोबाइल में रिकार्डिंग की क्लीपिंग हों। एक बात यह भी है कि चोर कभी भी अपने आपको चोर कहलवाना पसंद नहीं करता। बेचारा वह भला आदमी कबसे कह रहा था कि मुझे रिकार्डिंग करना आती ही नहीं लेकिन कमेटी के सदस्यों ने उनकी एक न सुनी। सीधे बाहर निकाल दिया। ये गलत बात है!
      ऐसा लगता है टीम अण्णा को एक बैठक बुलाकर अपनी कमेटी का नाम बदलना चाहिए। टीम अण्णा को अपनी कोर कमेटी का नाम बदलकर  इसे कोर की जगह 'चोर' कमेटी कर देना चाहिए। क्योंकि इसके दो कारण है। एक तो यह कि पिछले एक साल में ही 25 लोगों की इस कमेटी से स्वामी अग्निवेश और काजमी जैसे 2 चोर बाहर हो चुके हैं। दूसरा यह है कि 'चोर' शब्द का टीम अण्णा से गहरा नाता है। मनीष सिसौदिया ने 'चोर की दाढ़ी में तिनका' मुहावरे का प्रयोग करके पहले भी फहीजत कर दी थी। और अरविन्द केजरीवाल भी देश के सांसदों को 'चोर', लुटेरे और हत्यारे की संज्ञा देकर काफी बदनामी करा चुके हैं.
     अण्णा हजारे कई बार अनशन कर चुके हैं। कई बार अपनी बात को भी मनवा चुके हैं। कई लोगों की बात भी मानते हैं। लेकिन मेरी बात न मानते हैं, न ही सुनते हैं। सरकार भले ही झूठे आश्वासन देकर अनशन तुड़वा देती है लेकिन उनकी टीम तो कहीं का न छोड़ेगी। इसलिए मेरी बात मान लें तो अच्छा है। कब से चिल्ला रहा हूं कि...भ्रष्टाचार हमारी रग-रग में समा चुका है। देश आज नहीं तो कल सुधर ही जाएगा। लेकिन पहले अपनी टीम को ही सुधार लो....।

Wednesday, April 18, 2012

अपमान हुआ तो क्या हुआ... सम्मान तो हुआ

            बहस करना अच्छी बात है। बेकार की बहस यानी बेकार की बात। इसलिए बेकार की बहस कभी नहीं करना चाहिए। लेकिन हमारे पड़ौसी गुप्ता जी हैं कि मानते ही नहीं। सुबह-सुबह घर आ गए। पूछने लगे, न्यूयार्क जाना है कितना समय लगेगा। मैंने उनको बताया कि न्यूयार्क भारत से 12 हजार से अधिक किलो मीटर दूर है। हवाई यात्रा होती है। 12 घण्टे तो लगते ही होंगे। हां! शाहरूख खान के साथ जाओगे तो 2 घण्टे एक्स्ट्रा जोड़ लेना। अमेरिका वाले शाहरूख की जबरदस्त तलाशी लेते हैं। मुझे तो लगता है कि शाहरूख को अमेरिका जाना ही नहीं चाहिए।
          बस क्या था, शुरू हो गई बहस। गुप्ता जी बोले, हां आप तो ऐसा बोल सकते हो, क्योंकि शाहरूख के बारे में कुछ जानते ही नहीं। शाहरूख को अमेरिका क्यों नहीं जाना चाहिए? उनको वहां सम्मान मिलने वाला था। सम्मान, सम्मान होता है। चाहे इसके लिए अपमान होना हो तो हो जाए। क्या पता ''कल हो न हो''। वैसे भी अपमान को कौन याद रखता है, सम्मान तो हमेशा याद रखे जाते हैं। आप तो जानते ही नहीं इस ''बाजीगर'' को कितने सम्मान मिल चुके हैं।
         ''ओम शांति ओम'' करते-करते शाहरूख 14 फिल्मफेयर और 8  बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार जीतकर ''बादशाह'' बन चुके हैं। सिनेमा में उनके योगदान के लिए हमने उन्हें 2005 में पद्श्री भी प्रदान किया। लेकिन इतने सम्मानों से क्या होता है! हमें तो अमेरिका का भी सम्मान चाहिए। अब आपको क्या मालूम, अमेरिका के येल विश्वविद्यालय पहुंचने से पहले शाहरूख की तलाशी तो हुई लेकिन इसी विश्वविद्यालय में उन्हें विश्वविद्यालय का सर्वोच्च सम्मान ''चब फेलोशिप'' भी मिला था।
          आप देखना अब भूल जाएंगे कि अमेरिका में दो बार शाहरूख की जबदस्त तलाशी ली गई। सब भूल जाएंगे कि शाहरूख को कपड़े उतारकर तलाशी देना पड़ी। भाई साहब! ''कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है''। वैसे हमने इस घटना के बाद बहुत कुछ पाया भी है। अमेरिका ने शाहरूख का अपमान किया लेकिन शाहरूख को सम्मान मिला और हमें अमेरिका पर दबाव बनाने का मौका। आपने देखा नहीं क्या! हमारे विदेश मंत्री ने अमेरिका पर कितना दबाव बनाया। माफी तक मांगवा ली। वैसे अमेरिका पर हम दबाव कब बना पाते थे। लेकिन शाहरूख का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि वह बार-बार हमें ऐसा मौका देता है। भारतीय सम्मान कितने भी सम्मान से दिए जाएं कहां फर्क पड़ता है। हां! अपमान के बाद मिला सम्मान हमेशा याद रखा जाता है। इसलिए शाहरूख जितनी भी बार अमेरिका जाना चाहे जा सकते हैं। क्यों सही कहा न...।
          हां! गुप्ता जी आप सही कहते हैं। वैसे आप न्यूयार्क क्यों जा रहे हो? अरे! यह तो बताना ही भूल गया। न्यूयार्क में मुझे भी सम्मान मिलने वाला है। देखना मेरी भी तलाशी हुई तो सम्मान तो लेकर आऊंगा ही और माफी भी मंगवा लेंगे अमेरिका से.....।