Wednesday, October 31, 2012

हमारा 'नेतीय गुण' है विशेष

      

      किसी को काम न करने पर सजा मिलती तो समझ आता, लेकिन काम करने पर सजा मिले फिर क्या होगा। भैया इटली का कानून ही ऐसा है। अभी पिछले दिनों भूकंप की सही जानकारी न देने वाले छह वैज्ञानिकों को वहां एक अदालत ने छह साल की सजा सुना दी। बेचारे वैज्ञानिक हैं इसलिए सजा के लिए तैयार हो गए। अगर भारतीय नेता होते तो मामला ही कुछ और होता।
       हां! कानून तो कानून होता है। कोई पालन करता है तो कोई तोड़ता है। तो कोई कानून मंत्री होने की हेकड़ी दिखाता है। भारत में तो कानून मंत्री होने के कई फायदे हैं। कोई कितने भी आरोप लगाए, कितनी भी गलतियां करे, भ्रष्टाचार के कितने भी आरोप लगे, उल्टा शाबाशी ही मिलती है।
       थोड़ी देर के लिए सोचा जाए कि यदि इटली के वैज्ञानिकों में थोड़े बहुत भी भारतीय नेताओं के कुछ 'नेतीय गुण' होते तो वे बड़े आराम से बच निकलते। वैज्ञानिक नेताओं की मधुर वाणी में बोलते कि 'देखिए हमने तो सही भविष्णवाणी की थी लेकिन इसमें भूकंप ने राह बदल दी तो इसमें हमारी क्या गलती है। गलती इसमें भूकंप की है। इसमें हम दोषी नहीं हो सकते हैं।
       वैज्ञानिक कहते कि हमारे देश से अच्छा तो भारत है, जहां नेताओं को गलती करने पर प्रमोशन मिलता है और काम करने पर 'मोटा' कमीशन। एकाध एनजीओ खोल लेते तो कई विकलांगों का भला कर देते। विकलांगों की दुआएं मिलतीं और विदेश मंत्री भी बन जाते। हमारी किस्मत फूट गई इटली में रहकर। भारत में हमारी इटली वाली मैडम भी हमें गलती करने पर भी पर बचा लेतीं। उन्होंने कई लोगों को भी बचाया है। अपने दामाद को भी बचाने के लिए उन्होंने पूरी ताकत लगा दी। हम भी तो उनके लिए कुछ महत्वपूर्ण होते ही।
अपने 'नेतीय गुण' के कारण वैज्ञानिक सजा सुनाने वाले न्यायाधीश और अपोजिशन के वकील को अपने इलाके में आने पर देख लेने की धमकी भी दे देते।
        कुछ वैज्ञानिक तो अपने कुछ विशेष नेताओं के जैसे विवादित बयान भी देते। वैज्ञानिक सजा सुनने के बाद पत्रकारों से कहते कि चूंकि न्यायाधीश का संबंध विपक्षी पार्टी है इसलिए हमें सजा सुनाई गई। वरना इसमें हमारी कोई भी गलती नहीं थी। न्यायाधीशों ने विपक्षी पाटिर्यों के कहने पर हमें सजा सुनाई है।
अगर भारतीय नेताओं की तरह इटली के वैज्ञानिकों में 'नेतीय गुण' होते तो सच मानिए एक भी वैज्ञानिक न तो सजा होती और न ही यह पता चलता कि वहां कभी कोई भूकंप आया था। अगर किसी को पता भी चल जाता कि भूकंप आया है तो मरने वालों का आंकड़ा कभी भी पता नहीं चल पाता। हमारे भारतीय नेताओं के 'नेतीय गुण' का विशेष महत्व है। यह अब पूरी दुनिया को समझ लेना चाहिए।

Tuesday, October 23, 2012

तरक्की के लिए जरुरी है 'टॉयलेटीकरण'


          हम लोग अपने दीपू की शादी को लेकर बड़े चिंतित थे। कोई न कोई समस्या के कारण विवाह में दिक्कत हो जाती थी। वह तो भला हो अपने पंडित रामदीन जी का जिन्होंने ऐसा उपाय बताया कि चट मंगनी, पट विवाह का कार्यक्रम बन गया। रामदीन जी हमारे गांव के अच्छे ज्योतिष हैं, इसलिए आज हम अपनी श्रीमती जी के साथ उनके कुटिया में पहुंच गए थे। हमारे दीपू की कुंडली को पूरे 19 मिनट तक देखा। कुंडली देखने के बाद आचश्र्यजनक मुद्रा बनाते हुए बोले-'अरे यार! दीपू की कुंडली के हिसाब से तो इसका विवाह साल भर पहले जो जाना चाहिए था। ग्रहों की चाल भी ठीक है। अब समस्या समझ नहीं आ रही है कि आखिर शादी में इतना विलंब क्यों हो रहा है?'
             इसके बाद वे काफी देर तक ध्यान लगाने की मुद्रा में बैठे रहे। फिर अचनाक उन्होंने ऐसा सवाल किया जिसका ज्योतिष से कोई संबंध तो था नहीं लेकिन हमारे दीपू की शादी से जरूर था।
रामदीन जी ने हमसे पूछा- 'क्या तुम्हारे घर में टॉयलेट है?'
           सवाल काफी विचित्र था लेकिन हमारे प्रतिप्रश्न से बात स्पष्ट हो गई। हमारी श्रीमती जी ने पल्लू को दांतों में दबाते हुए पूछा 'पंडित जी टॉयलेट का हमारे दीपू की शादी से क्या संबंध है? हमारे घर में टॉयलेट नहीं है क्या इसलिए ही हमारे दीपू का संबंध नहीं हो पा रहा है?'
जी भाभी जी..रामदीन जी बोले। आपने हमारे देश के केन्द्रीय ग्रामीण एवं विकास मंत्री जयराम रमेश जी का बयान नहीं पढ़ा क्या?
             मंत्री जी ने बयान दिया है कि-'नो टॉयलेट, नो ब्राइड' अर्थात् जिस घर में टॉयलेट नहीं हो वहां लड़कियों को शादी नहीं करना चाहिए।' लो टॉयलेट का महत्व आपको पता नहीं है। भईया घूरे के भी दिन फिरते हैं। आज टॉयलेट के फिर रहे हैं। मुझे तो लगता जिस प्रकार टॉयलेट को महत्व दिया जा रहा है उससे तो आने वाले समय में स्थितियां और विचित्र होने वाली हैं। चुनाव आयोग ने कहीं यह फरमान जारी कर दिया कि जिस नेता का टॉयलेट चुनाव चिन्ह् हो जनता उसी को वोट दे तो क्या होगा? कई नेता रोजाना चुनाव आयोग के दफ्तर के चक्कर लगाते हुए नजर आएंगे। विद्यालयों में टी फॉर टी नहीं फिर टॉयलेट ही पढ़ाया जाएगा। बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाने से पहले कक्षाओं से पहले माता-पिता द्वारा टॉयलेट देखना उनकी प्राथमिका में होगा। निजी स्कूलों और कॉलेजों के विज्ञापनों में एयर कंडीशन क्लास रूम की जगह एयर कंडीशन 'टॉयलेट' लिखा हुआ मिलेगा।
          काफी देर तक चर्चा होती रही। चर्चा इस बात पर भी हुई की यह वही मंत्री हैं जिनके मुखिया योजना आयोग के अध्यक्ष हैं। ऐसा आयोग जो ग्रामीण इलाकों में टॉयलेट बनाने की जगह टॉयलेट घोटाला करता है। योजना आयोग ने अपने मुख्यालय योजना भवन में टॉयलेट बनाने के लिए 35 लाख रुपए खर्च कर दिए। इन टॉयलेट का इस्तेमाल करने के लिए 60 अफसरों को स्मार्ट कार्ड जारी भी किए गए हैं। इसलिए मेरी मानिए तो अपने घर में एक सुंदर सा टॉयलेट बनवा दीजिए, फिर देखना दीपू के लिए कितने रिश्ते आएंगे।
          रामदीन जी की भविष्यवाणी एकदम सही साबित हुई। जिस दिन टॉयलेट बनकर तैयार हुआ, उसी दिन शाम को हमारे दीपू का रिश्ता तय हो गया।  आज हम बहुत खुश हैं। जिस प्रकार हमारे परिवार में टॉयलेट के बनने से प्रगति हुई है उसको देखकर तो हम भी यही कहेंगे कि देश की तरक्की के लिए भी 'टॉयलेटीकरण' बहुत जरुरी है।

Tuesday, October 16, 2012

बंदूक वाले सदाचारी नेताजी


 

    आज रामदीन जी के चेहरे पर इस्माइल देखकर हमारे चेहरे पर भी इस्माइल आ गई। पूछने पर बोले-'भाई साहब एक चुनावी सभा से आ रहा हूं। हम तो फिदा हो गए नेताजी के भाषण सुनकर। बेचारे बड़े ही भोले हैं। आजकल जहां परमाणु बम, ड्रोन हमले और आधुनिक हथियारों की बात होती हो, ऐसे में यदि कोई नेता बंदूक की बात करे तो यह उनका भोलापन ही होगा।' 
     'नेताजी कह रहे थे कि यदि उनकी सरकार बनी तो बंदूक के लायसेंस की प्रक्रिया को सरल किया जाएगा। बंदूक ही हमारी शान है। यह बयान ही उनकी आत्मीयता को प्रकट करता है। उनको हमारे युवाओं की इतना चिंता है कि वह उन्हें बंदूकों का कारोबार कराना चाहते हैं।'
      नेता और आत्मीयता! सुनते ही पहले तो हंसी आई फिर बाद में मैंने कहा-'रामदीन जी, प्रदेश की जनता को सरकार बनते ही शस्त्र लायसेंस रेबड़ी की तरह बांटने की योजना बनाते नेताजी अगर अन्य मुद्दों पर 'बोल बच्चन' करते तो बेहतर होता। यदि यह कहा जाता कि हम सरकार बनाते ही प्रदेश में हर साल कुपोषण की वजह से होने वाली लगभग ३५ हजार बच्चों की मौत का आंकड़ा कम करने का प्रयास करेंगे तो कितना अच्छा होता। यदि यह कहा जाता कि सरकार बनते ही प्रदेश के लगभग ३९ लाख बेरोजगार युवाओं को रोजगार दिलाया जाएगा तो क्या चुनाव जीतना मुश्किल होता?' 
       क्या जमाना आ गया है जिन युवाओं के कंधों पर नेताजी को परिवारिक की जिम्मेदारियों का बोझ डालना चाहिए वह उन कंधों पर बंदूकों का बोझ डालने की बात कर रहे हैं! 
       हां! रामदीन जी...। वैसे भी जनता का सरकारों पर विश्वास ही कहां रहा है। आज बंदूक दिलाने की बात कर रहे हैं, फिर गोलियों की संख्या सीमित कर देंगे, बिल्कुल एक साल में मिलने वाले सब्सिडी के छह सिलेण्डरों की तरह!
       आखिर रामदीन जी भी कब तक चुप बैठते। बोले-'अरे भाई साहब! आपको तो कुर्तक करने की आदत है। नेताजी ने सभी समस्याओं का समाधान निकालने के लिए ही तो बंदूक की बात कही है। बंदूक होगी तो कोई भी अपनी रोजी-रोटी की जुगाड़ कर लेगा, और सिलेण्डर की भी। हॉकर को धमकाओ तो सिलण्डेर मिल जाएगा और अफसरों को धमकाओ तो नौकरी। वाह भाई वाह! आप भले ही कुछ भी कहें, लेकिन हम तो नेताजी के फेन हो गए हैं!'

Thursday, October 11, 2012

हमारे पास भी बहुत बुद्धिमान हैं श्रीमान्


     

   बुद्धिमान केवल क्या विदेश में ही बसते हैं? हमारे यहां कोई बुद्धिमान नहीं है क्या? तो फिर बुद्धिमत्ता परीक्षा (इंटीलिजेंस टेस्ट) में भारत को निमंत्रण क्यों नहीं दिया गया? अगर बुद्धिमत्ता परीक्षा में हम भारतीय को बुलाया जाता तो हमारे पास तो इतने बुद्धिमान हैं कि वह अच्छे-अच्छों की छुट्टी कर देते। ये तो गलत बात हुई न, अकेले-अकेले प्रतियोगिता कर ली और मैडल भी खुद ही जीत लिया। 
          ब्रिटेन की एक बारह वर्षीय छात्रा ओलिविया मैनिंग ने बुद्धिमत्ता परीक्षा में 162 अंक पाकर अल्बर्ट आइंस्टीन और स्टीफन हॉकिंग को भी पीछे छोड़ दिया है, ये भी कोई खबर हुई क्या? खबर तो तब बेहतरीन होती जब हम भारतीयों को इस प्रतियोगिता में शामिल किया जाता।
         अगर इस प्रतियोगिता के लिए भारतीयों को बुलाया जाता तो हमारे पास कौन-कौन से प्रतिभागी हो सकते थे इस पर मैंने काफी मंथन किया। पूरे देश को मानसिक दृष्टि से खंगलाने के बाद कुछ लोग मेरे दिमाग में आए हैं। भारत की ओर से इस प्रतियोगिता के लिए सबसे अच्छा कोई प्रतियोगी हो सकता था तो वह कांग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा हो सकते थे। यह वाड्रा के दिमाग का ही कमाल तो है कि उन्होंने 3 साल 300 करोड़ की सम्पत्ति जुटा ली। वरना आजकल तो इतनी महंगाई है कि 300 करोड़ की सम्पत्ति 3 साल में खत्म हो जाए। उनकी बुद्धिमत्ता तो तभी साबित हो चुकी थी जब उन्होंने अपनी सास के रूप में श्रीमती सोनिया गांधी को स्वीकार किया था। 
        बुद्धिमत्ता परीक्षा में भारत की ओर से दूसरे प्रतियोगी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी हो सकते थे। अपने अखिलेश जी को देखिए न पिताजी की आज्ञा का पालन करते हुए मुख्यमंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद संभाला हुआ है। इनकी बुद्धिमत्ता का मैं तो उसी वक्त कायल हो गया था जब उन्होंने एक साथ 50 मंत्रालय की जिम्मेदारी को स्वीकार किया था। जो व्यक्ति एक साथ 50 मंत्रालयों का काम-काज संभाल सकता है उसमें कितना दिमाग होगा आसानी से समझा जा सकता है। 
         सुरेश कलमाड़ी, ए.राजा, कनिमोझी, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा, ये लोग भी कम बुद्धिमान नहीं है। बड़े-बड़े घोटाले कर फिर से राजनीति करना, कोई दिमाग वाला व्यक्ति ही कर सकता है। मुलायम सिंह, ममता बनर्जी, मायावती, शरद पवार जैसे राजनेताओं को भी इस प्रतियोगिता में भेजा जा सकता था। जोड़-तोड़ की राजनीति का अनुभव जितना इन राजनेताओं को है उससे निश्चिततौर पर हम 162 अंक से तो नीचे आते ही नहीं। कोई न कोई जोड़-तोड़ कर यह नेता कुछ न कुछ जीतकर तो आते ही। अगर हम भारतीयों को इस बुद्धिमत्ता परीक्षा में शामिल किया जाता तो 12 वर्षीय छोकरी ओलिविया को मात तो दे ही देते, क्योंकि हमारे पास एक से एक बुद्धिमान हैं। 

Wednesday, October 3, 2012

पेटू सरकार



          इंसान जिंदगी भर पेट के लिए दौड़ भाग करता रहता है। भगवान की अर्चना करने से भी ज्यादा पेट पूजा जरूरी होती है। बड़े-बड़े संत भी कह गए हैं कि 'भूखे पेट भजन न होये गोपाला'। पोषण आहार न मिले तो कुपोषण जैसी खतरनाक बीमारी हो जाती है। इसलिए खाना बहुत महत्वपूर्ण है। खाने का महत्व भले ही देश की जनता नहीं जानती हो लेकिन हमारी केन्द्र सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अच्छी तरह से जानते हैं। जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए रोज भोजन किया जाता है ठीक उसी प्रकार सरकार को स्वस्थ रखने के लिए 'भोज' दिया जाता है। 
         पुराने दिन याद आ रहे हैं जब निमंत्रण पर जाते थे तो पंगत में नजदीक में बैठे व्यक्ति की थाली में घी देखा करता था। दूसरों की तरह मुझे भी हमेशा दूसरे की थाली में घी देखने की आदत थी। दूसरों की तरह मुझे भी हमेशा दूसरे की थाली में घी ज्यादा ही नजर आता था। हालांकि मैं केवल देखता ही था, चर्चा कभी किसी से नहीं करता। लेकिन आज मुझे विश्वास नहीं होता कि भारतीय कितने लालची और अमानवीय हो गए हैं। केन्द्र सरकार की तीसरी वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा दिए गए भोज को ही सार्वजनिक कर दिया। लोग पहले घी देखते थे लेकिन देखो तो, हद ही पार कर दी। पूरी थाली ही देख डाली। देखने पर पता चला कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 375 मेहमानों के भोज पर 29 लाख रुपए खर्च कर दिए। एक व्यक्ति की थाली पर 7721 रुपए खर्चा हुआ। 
        मुझे समझ नहीं आ रहा है कि लोग सरकार की सराहना करने की बजाए आलोचना क्यों कर रहे हैं? आलोचकों को पता होना चाहिए कि विदेशी लोग भारत में व्याप्त भुखमरी के लिए हमेशा ताने देते रहते हैं। हमारी केन्द्र सरकार ने जो काम किया है उस पर तो हमें गर्व होना चाहिए कि उन्होंने भुखमरी जैसे कलंक को मिटाने की एक कोशिश की। इस कृत्य से हम विदेशियों को साक्ष्य देकर बता सकते हैं कि हमारे यहां कोई भुखमरी नहीं है। हमारे यहां एक थाली पर 7721 रुपए खर्च किए जाते हैं। 
हमारी सरकार विचारों से भले गरीब हो लेकिन खर्चा करने में गरीब नहीं है। इस बात के प्रमाण हम पहले भी देख चुके हैं। विदेशियों को पता भी नहीं होगा कि हमारे यहां योजना आयोग ने दिल्ली में दो शौचालयों के नवीनीकरण पर ही 35 लाख रुपए खर्च कर दिए। साफ-सफाई और भोजन पर कैसे ध्यान दिया जाता है यह भारतीयों से सीखा जा सकता है। 
       ऐसा नहीं है कि भारत सरकार के मंत्री केवल खाते ही रहते हैं। मंत्री लोग घूमने फिरने में भी कोई कंजूसी नहीं करते हैं। 2011-12 में 678 करोड़ 52 लाख 60 हजार रुपए मंत्रियों के विदेश दौरों पर स्वाहा हो चुके हैं। इस वर्ष पिछले साल से 12 गुना ज्यादा खर्च विदेशी दौरों पर किया गया। 
       जहां तक खाने को लेकर हो रही बदनामी का सवाल है तो मुझे लगता है कि सरकार को कोई चिंता नहीं करनी चाहिए। क्योंकि हम तो पहले ही कोयला आवंटन, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, 2-जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्र मण्डल खेल, आदर्श सोसायटी जैसे घोटाले कर जनता की गाढ़ी कमाई को डकार चुके हैं। इसलिए एक थाली पर खर्च की गई 7721 रुपए जैसी छोटी सी रकम की बात ही क्या करना!!

Wednesday, September 26, 2012

कुछ अच्छा होता है तो दाग अच्छे हैं!

         समझदार, ईमानदार, अनुभवी, निपुण, शांत स्वभाव, चिंतनशील जैसे शब्दों का एक पर्यायवाची ढूंढा जाए तो इसका जवाब 'प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह' होना चाहिए। वैसे तो उन्हें कोई सीख देना मेरी वेबकूफी ही होगी लेकिन फिर भी क्या करूं, मन तो नहीं मानता ना। बेचारे काफी दिनों से परेशान चल रहे हैं। उनको चिंता में देखकर मेरी भी चिंता काफी बढ़ जाती है।
       दाग किसे अच्छे लगते हैं। अब देखो न कोयला मंत्रालय संभालते-संभालते काले धब्बे लग ही गए। और तो और 2-जी स्पेक्ट्रम, महंगाई, सिलेण्डरों की सीमित संख्या जैसे कई मामलों ने भी उलझन में डाल दिया है। दामन पर रोज कोई न कोई दाग लग जाता है। दाग को थोड़ा साफ करने के लिए भारत में विदेशी कंपनियों को सीधे निवेश करने की छूट भी दे दी लेकिन कमबख्त दाग है कि मिटता ही नहीं।
        प्रधानमंत्री को पता होना चाहिए कि आजकल प्रेक्टिकल होने का जमाना है। जनता जवाब मांगती है। इसलिए यदि मैं प्रधानमंत्री होता तो इन सभी उलझनों से बच निकलने के लिए टीवी पर आने वाले विज्ञापन का सहारा लेता। यदि कोई विपक्षी पार्टी का नेता, अण्णा हजारे, अरविंद केजरीवाल, बाबा रामदेव टाईप के सामाजिक कार्यकर्ता मुझसे सवाल करते तो मैं उनसे एक ही बात कहता। 'देखो भाई-यदि दाग लगने से कुछ अच्छा होता है तो दाग अच्छे हैं।' वाशिंग पाउडर 'सर्फ एक्सेल' का विज्ञापन तो सभी ने देखा होगा। विज्ञापनों से भी सीख लेना चाहिए।
         मैं प्रधानमंत्री होता तो बताता कि भले ही हमारी सरकार में 2-जी स्पेक्ट्रम का घोटाला हुआ है लेकिन आप जानते नहीं देश कितना तरक्की कर रहा है। गरीब से गरीब व्यक्ति के पास मोबाइल है। जब कोई गरीब कान पर लगाकर जब हैलो... बोलता है तो कितना अच्छा लगता है, इसे बयान नहीं किया जा सकता। हमारी सरकार तो अगले साल से रोमिंग फ्री करने जा रही है।
       इसी प्रकार सिलेण्डरों की संख्या निर्धारित करने के पीछे भी देश की तरक्की को समझना चाहिए। हम देश को विकसित करना चााहते हैं। कहां रोज-रोज सिलेण्डर की चिंता, अब तो इडक्शन कुकर का जमाना है।  पेट्रोल-डीजल के दाम भी इसलिए बढ़ाए जा रहे हैं कि लोगों को पैदल चलने की आदत डाली जाए जिससे लोगों का स्वास्थ्य ठीक रहे।
       हमने विदेशी कंपनियों को सीधे निवेश करने की छूट भी इसलिए दी क्योंकि विदेशों में यह संदेश जाएगा कि दुनिया में बड़े दिल वाला यदि कोई देश है तो वह भारत ही है। हमारे बड़े दिल का ही कमाल है कि जिस कंपनी का अमेरिका में विरोध हो रहा है, उस कंपनी के लोग परेशानी में हैं तब हमने उन्हें सराहा दिया। लोग समझते ही नहीं, भारत कितनी तरक्की कर रहा है।
        ऐसे कई मामलों हैं जिन पर भारत लगातार प्रगति कर रहा है। इसलिए तो हमारे प्रधानमंत्री को भी खुलकर जनता के सामने आकर यह कहने की बजाय कि  'पैसे पेड़ पर नहीं उगते', के स्थान पर कहना चाहिए-'यदि दाग लगने से कुछ अच्छा होता है तो दाग अच्छे हैं।'
 

Wednesday, September 19, 2012

हमारी स्वीट् भाषा हिन्दी...


         आज का दिन रामदीन जी के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा। अभी एक स्कूल में हिन्दी दिवस पर 'स्पीच' देकर आ रहे हैं। मैं भी उनके साथ गया था। 'प्रोगाम' काफी अच्छा रहा। शिक्षक होने के नाते रामदीन जी की 'नॉलेज' अच्छी है, जिसका अनुभव मुझे भी हुआ। लेकिन रास्ते में लौटते वक्त थोड़ा विवाद हो गया।
        रामदीन जी जब बोल रहे थे तब मैंने देखा कि सभी उनको कितने ध्यान से सुन रहे हैं। माइक को थामते हुए रामदीन जी ने कहा कि हिन्दी हमारी मातृभाषा है। हमें हिन्दी का सम्मान करना चाहिए। उनके ये शब्द बोलते ही बच्चे काफी देर तक तालियां बजाते रहे।
       अब आपको तो पता ही है कि तालियां कितना उत्साह बढ़ाती हैं, सो रामदीन का भी उत्साह बढऩे लगा। आगे वह बोले कि पूरी दुनिया में सबसे 'स्वीट्' भाषा यदि कोई है तो वह हमारी हिन्दी ही है। हिन्दी की इसी 'क्वालिटी' के कारण कई देशों अमेरिका, चाइना, जापान, मलेशिया और न जाने कहां-कहां लोग हिन्दी सीखने की कोशिश कर रहे हैं।
       रामदीन जी बोले- 'हिन्दी भाषा की सरलता के कारण इसे बोलने और लिखने में भी काफी आसानी होती है। यही कारण है कि आज हमारी 'कंट्री' में करोड़ो लोग हिन्दी बोलते हैं। उन्होंने कहा कि लेकिन दुर्भाग्य इस बात का है कि आज हिन्दी को कई लोग भूलते जा रहे हैं। 'नो वडी वांट टू स्पीक हिन्दी'। इसलिए हमको हिन्दी भाषा का सम्मान दिलाने के लिए यह जरूरी है कि हम सभी हिन्दी को अधिक से अधिक 'यूज' करें और दूसरों को भी 'यूज' करने के लिए निवेदन करें। यदि हम इस प्रकार का प्रयास लोगों के बीच जाकर करेंगे तो 'डेफीनेटली' हम हिन्दी को विश्व की सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषा के रूप में स्थापित कर सकेंगे। आप लोगों ने मुझे जो बोलने का अवसर दिया इसके लिए 'थैंक्यू'।' इसके बाद रामदीन जी मंच पर आ गए।
      कार्यक्रम यहां भी खत्म नहीं हुआ। कार्यक्रम के अंत में रामदीन जी के उपन्यास 'वन डे' का विमोचन भी किया गया। अंग्रेजी भाषा में लिखित इस उपन्यास की सभी ने तारीफ की।
      घर लौटते वक्त रामदीन जी फूले नहीं समा रहे थे। वह बोले-'आई डोंट थिंक देट' स्कूल वाले मुझे इतना 'रेसपेक्ट' देंगे। 'आई नेवर फॉरगेट दिस रेसपेक्ट'। फिर उन्होंने पूछा अच्छा छोड़ो, तुमने तो पूरी 'स्पीच' सुनी है तो तुम मुझे कितने 'प्वाइंट' देगो? मैं क्या करता। काफी देर तक तो चुप रहा। लेकिन फिर मुझे बोलना ही पड़ा-'आई विल गिव यू जीरो मार्स्क'। क्योंकि हम जैसे लोगों की वजह से ही हिन्दी को उसका सही सम्मान नहीं मिल पा रहा है। मेरी बात रामदीन जी समझ गए कि मैं क्या कहना चाहता हूं। अरे...आप समझे या नहीं? 

Wednesday, September 12, 2012

अब हमें भी चाहिए आरक्षण


        रेलवे आरक्षण, धार्मिक आरक्षण, जाति आरक्षण, महिला आरक्षण, आरक्षण में आरक्षण, पदोन्नती में आरक्षण, प्रकाश झा की फिल्म 'आरक्षण' इतने सारे आरक्षण का प्रभाव रामदीन जी के घर पलने वाले पालतु पशुओं पर भी पडऩे लगा है। हर रोज कोई न कोई जानवर उनके सामने खड़े होकर अपनी समस्या बताने लगता है। रामदीन जी भी बड़े चालाक हैं कि आरक्षण का लालच देकर सभी को अपने बंधन में फांस रखा है।
         कल सुबह की बात है। रामदीन का कालू (कुत्ता) उनके पास आया और बोला- 'मुझे आरक्षण चाहिए।' कालू बोला-'साब! रामू (हाथी) हमसे काफी ताकतवर है। वह बहुत शक्तिशाली है इसलिए अपने भोजन पानी की व्यवस्था स्वयं कर लेता है। वह दूसरे के हिस्से पर भी मुंह मारता-फिरता है। कल ही उसने हमारे हिस्से की भी रोटी खाली ली। हमारे खाने के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा। गोलू (शेर) भी हम जैसे छोटे लोगों पर काफी अत्याचार करता है। वह हमें डरा धमकाकर हमसे भोजन आदि की व्यवस्था करने के लिए दबाव बनाता है।'
         कालू चुप हुआ तो रानी (बिल्ली) भी बोल पड़ी-'हां! मालिक मुझे भी मेरा परिवार पालने में काफी परेशानी हो रही है। मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं। आप तो जानते ही हैं कि आजकल चूहों की संख्या भी कम हो रही है। दूध पीने के लिए घर-घर भटकना पड़ता है। और तो और मैं स्त्री जाति की भी हूं इसलिए हमारी इस जाति को विशेष आरक्षण मिलना चाहिए। मुझे लगता है कि हमारे लिए दूध की अलग से व्यवस्था होनी चाहिए।' रानी ने दबाव बनाते हुए कहा-'देखिए आप हमारी बात मान लिजिए, नहीं तो हमें मजबूरन आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।'
         इसके बाद कालू ने विरोध करते हुए कहा- 'साब! आपने अगर रानी के समाज को अधिक महत्व दिया तो अच्छा नहीं होगा। हमारे समाज ने भी अण्णा हजारे की तरह 'नाक दबाकर मुंह खुलवाने' की योजना बना ली है।' हमारा समाज आपकी नाक में दम कर देगा।
        लेकिन रामदीन जी भी अपना चिडिय़ाघर चलाना अच्छी तरह जानते हैं। उन्होंने परेशान जानवरों को बताया कि मैं तो चाहता हूं कि आपके समाज को उन्नती, अच्छा भोजन, अच्छा रहन-सहन मिले लेकिन कम्बख्त आपके पड़ोसी (विपक्षी) हमें ऐसा करने ही नहीं देते। चिंता मत कीजिए कुछ दिन और सहन कीजिए मैं आपको आश्वासन देता हूं कि आपको आपका हक दिलाया जाएगा। एक काम कीजिए आपकी जो-जो मांगें हैं कृपया एक प्रस्ताव बनाकर मेरे समक्ष प्रस्तुत कीजिए। आरक्षण सभी को मिलेगा।
रामदीन जी के इस आश्वासन का लॉलीपॉप चूसते हुए कालू और रानी शांत हो गए। मैं तो पहले से ही शांत बैठा हुआ था। थोड़ी देर बाद मैं भी अपने बिल (घर) में आ गया।

Thursday, September 6, 2012

शाबाश...बेटा!

       ''उल्लू, गधा कहीं का, चल भाग यहां से, आज के बाद मुझे मुंह नहीं दिखाना। क्या मैंने तुझे इस दिन के लिए बड़ा किया था कि तू अपने बाप की बात नहीं मानेगा।'' -रामदीन जी आज जब अपने बेटे को बुरी तरह फटकार रहे थे तब इस तरह की कुछ आवाजें मेरे जैसे कई पड़ौसियों के कानों में गूंज रही थीं। मुझसे रहा नहीं गया तो मैं उनके घर पर पहुंच गया।
        रामदीन जी मुझे देखते ही बोले-''अच्छा हुआ यार तुम आ गए। अब तू ही समझा मेरे बेटे को।''
चूंकि मामला थोड़ा गंभीर लग रहा था इसलिए मैंने अपनी आंखें बड़ी कर, माथे को सिकोड़ते हुए बड़ी सहजता से पूछा-''आखिर बात क्या है?''
        तब रामदीन जी ने बताया कि ''आज मैंने अपने रवि से पूछा कि भविष्य को लेकर कुछ सोचा है कि नहीं? या फिर यूं ही टीवी पर फिल्में देखता रहेगा। तो रवि ने जवाब दिया कि हां! मैंने सोच लिया है, मैं देश की सेवा करूंगा, सेना में जाऊंगा। बस वहीं मैंने माथा ठोक लिया।''
         तब मैंने कहा कि इसमें बुराई क्या है? रामदीन जी बोले- ये लो आप भी ना। मैं अपने रवि को इतनी देर से यही तो समझाने का प्रयास कर रहा हूं कि देश की सेवा में कुछ नहीं रखा। कोई खेल खेलना शुरू कर दे। कोई खिलाड़ी बन जा। करोड़ों में खेलेगा।
          आपको नहीं पता कि हमारी सरकार सेना के जवानों से ज्यादा खिलाडिय़ों पर दिल खोल कर पैसा लुटाती है। कोई खिलाड़ी ओलंपिक का कोई पदक जीत आए तो देखो कैसे करोड़ों रुपए इनाम में मिलते हैं। आप तो जानते ही होंगे कि सायना नेहवाल को अभी क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने करोड़ों रुपए की कार बीएमडब्ल्यू उपहार में दी है। सरकार के  खेल मंत्री भी राज्यसभा में बोल चुके हैं कि हमने लंदन ओलंपिक के लिए 142.43 करोड़ खिलाडिय़ों के प्रशिक्षण पर खर्च किए हैं। जानते हैं राष्ट्र मण्डल खेलों पर 70 हजार करोड़ रुपए से अधिक लुटा दिए। राष्ट्र मण्डल खेलों के शुभारंभ के मौके पर 60 करोड़ रुपए तो हमने केवल एक गुब्बारे पर ही फूंक दिए थे। इन सबसे अच्छा आईपीएल है। आईपीएल में कैसे खिलाडिय़ों की निलामी होती है। आईपीएल-5 के समय रविन्द्र जडेजा को 20 लाख डॉलर में खरीदा गया था।
         रामदीन का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। वे बोले ये गधा सेना में जाना चाहता है। उस सेना में जिसमें पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह खुद पांच पेज की चिट्ठी प्रधानमंत्री को लिखकर बता चुके हैं कि सेना की स्थिति ठीक नहीं है। सेना में टेंक, गोला, बारूद खत्म हो चुका है। पैदल सेना के पास हथियारों तक की कमी है। हवाई सुरक्षा के 97 फीसदी उपकरण बेकार हो चुके हैं, युद्ध के समय काम आने वाले पैराशूट्स भी खत्म हो गए हैं।
         हमारे देश के नेता एक ओर तो खिलाडिय़ों को पलकों पर बिठाते हैं, उधर सेना का कोई जवान जब किसी हमले में शहीद हो जाता है तो उनकी विधवाओं को देखकर मुंह मोड़ लिया जाता है। सैनिकों के लिए तैयार आदर्श सोसायटी के बंगलों पर नेताओं ने कब्जा कर लिया। कितने सैनिकों की विधवाओं को पेट्रोल पंप दिए जाने का आश्वासन दिया गया लेकिन कितने नेताओं के पंप चल रहे हैं।
       इन बाप-बेटों के चक्कर में मेरा भी दिमाग घूम गया। कुछ देर बाद रवि अपने आंसू पोछते हुए बोला-''आई एम सॉरी डैडी!'', आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करूंगा। देश की रक्षा के लिए मेरे दूसरे भाई हैं ना...! 
        काफी देर बाद रामदीन जी के चेहरे पर मुस्कुराहट आई और बोले-''शाबाश...बेटा!'', मुझे तुमसे यही उम्मीद थी।

Tuesday, August 28, 2012

अपने रामदीन जी की 'सरकार'

         


            सबसे पहले तो आपको सूचित करता हूं कि इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं। इस कहानी का पिछले दिनों हुई केन्द्र सरकार की छीछालेदर से भी कोई लेना देना नहीं है। मेरा मन एक फिल्म बनाने का कर रहा है। फिल्म का नाम भी सोच लिया है। 'सरकार'...। इस 'सरकार' का मशहूर फिल्म निर्माता रामगोपाल वर्मा की फिल्म 'सरकार' से भी कोई संबंध नहीं है। मेरी फिल्म कुछ अलग हटकर है।
          आज सुबह रामदीन जी घर आए तो चाय पीते-पीते अपनी फिल्म बनाने की योजना के बारे में ऐसी ही कुछ बातें कह रहे थे। हालांकि मेरा मन तो नहीं कर रहा था उनकी स्टोरी सुनने का, लेकिन उन्होंने जब 'सरकार'  कहा तो मेरी आंख एकदम खुल गई।
         रामदीन जी बोले-'देखो भाईसाहब... मैं जो फिल्म बनाने जा रहा हूं उसमें एक प्रधानमंत्री है जो हमेशा किसी के इशारे पर चलता है। कभी कुछ बोलता भी नहीं है। वैसे तो इनको ईमानदार लोगों में गिना जाता है लेकिन एक समय ऐसा आता है जब ये अपने मंत्रियों की तरह बड़े-बड़े घोटालों में फंस जाते हैं।
इसके बाद इनके साथी कुछ मंत्री जो स्वयं बड़े-बड़े घोटालों को अंजाम दे चुके होते हैं वह देश को बताने की कोशिश करते हैं कि हमारे प्रधानमंत्री ने कोई घोटाला नहीं किया है। वह तो देश की तरक्की में जी-जान से लगे हुए हैं। घोटालों का जिस प्रकार से सरकार एजेंसियां आंकलन कर रही हैं उनके बारे में सभी साथी मंत्री देश की जनता को बताते हैं कि सरकारी आंकड़े हमेशा झूठे होते हैं। वे तर्क देकर अपने प्रधानमंत्री का पूरी तरह बचाव करते नजर आते हैं।'
        फिल्म की कहानी मुझे धीरे-धीरे पसंद आने लगी। इसलिए मैंने पूछा-'इसमें विपक्षी पार्टियों का रोल भी तो होगा?' रामदीन जी ने बताया कि-'अरे भाईसाहब...! विपक्षी पार्टियां भी हैं। लेकिन यह 'सरकार' है ना, 'एक कान से सुनती है और दूसरे से निकाल देती है।' 'चोरी और सीना जोरी' सब चलता रहता है।
फिर मैंने सवाल किया-'अच्छा ये बताओ कि इसमें मुख्य किरदार किसका है?' मुख्य किरदार के बारे में रामदीन जी चुप हो गए। और मुस्कुराते हुए बोले-'मुख्य किरदार के लिए तो आपको मेरी फिल्म देखने के लिए सिनेमाघर आना पड़ेगा। अभी पूरी स्टोरी सुना दूंगा तो मेरी फिल्म पर ठीक उसी तरह प्रतिबंध लग जाएगा जिस प्रकार सोशल नेटवर्किंग साइटों पर लग गया है।'
       चाय नाश्ता खत्म हुआ। रामदीन जी के जाने के बाद मैं पूरे दिन यही सोचता रहा कि कितनी अजीब बात है। फिल्म भी काल्पनिक है और हमारी सराकर भी। क्योंकि आज जिस तरह देश चल रहा है वह मात्र कल्पना ही तो है। कोई लेपटॉप बांटने की बात करता है तो कोई गरीबों को मोबाइल, कोई 'आकाश' देकर आकाश में उडऩे के सपने दिखाता है तो कोई देश को महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, भूखमरी, कुपोषण से मुक्त करने की बात कहता है। रामदीन जी की फिल्म 'सरकार' और हमारी केन्द्र सरकार में कितनी समानताएं हैं। जब देश ही कल्पनाओं पर चल रहा है तो मुझे लगता है कि अपने रामदीन जी की फिल्म 'सरकार' भी हिट हो सकती है। क्योंकि वह भी तो कल्पनाओं पर आधारित है।