Wednesday, April 25, 2012

कोर कमेटी है या 'चोर कमेटी'


   चोर कई तरह के होते हैं। जैसे चप्पल चोर, पर्स चोर, आभूषण चोर आदि। सब चोरी करते हैं। इनके चोरी करने के तरीके भी अलग-अलग होते हैं। लेकिन कुछ चोर अलग किस्म के होते हैं। बिल्कुल टीम अण्णा से निकाले गए मुफ्ती शमीम काजमी और स्वामी अग्निवेश की तरह। ये ऐसे चोर होते हैं जो हमारे जज्बातों, बयानों और हमारी योजनाओं की चोरी करते हैं। स्वामी अग्निवेश ने भी जनता की भावनाओं को चोरी कर सरकार को सारी बात बताई और आन्दोलन कमजोर किया। कुछ ऐसा ही मुफ्ती शमीम काजमी कोर कमेटी की बैठक में मोबाइल से रिकार्डिंग कर कर रहे थे। काजमी, अग्निवेश बातें चोर हैं! जो बातें चुराकर दूसरों को बेचते थे!
    चोर कोई भी हो, वह जब भी पकड़ा जाता है, हमेशा यही कहता है कि मैंने चोरी नहीं की। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार काजमी ने कहा कि मोबाइल में रिकार्डिंग का बटन धोखे से दब गया होगा। उन्हें रिकार्डिंग करना आती नहीं। भले ही उनके मोबाइल में रिकार्डिंग की क्लीपिंग हों। एक बात यह भी है कि चोर कभी भी अपने आपको चोर कहलवाना पसंद नहीं करता। बेचारा वह भला आदमी कबसे कह रहा था कि मुझे रिकार्डिंग करना आती ही नहीं लेकिन कमेटी के सदस्यों ने उनकी एक न सुनी। सीधे बाहर निकाल दिया। ये गलत बात है!
      ऐसा लगता है टीम अण्णा को एक बैठक बुलाकर अपनी कमेटी का नाम बदलना चाहिए। टीम अण्णा को अपनी कोर कमेटी का नाम बदलकर  इसे कोर की जगह 'चोर' कमेटी कर देना चाहिए। क्योंकि इसके दो कारण है। एक तो यह कि पिछले एक साल में ही 25 लोगों की इस कमेटी से स्वामी अग्निवेश और काजमी जैसे 2 चोर बाहर हो चुके हैं। दूसरा यह है कि 'चोर' शब्द का टीम अण्णा से गहरा नाता है। मनीष सिसौदिया ने 'चोर की दाढ़ी में तिनका' मुहावरे का प्रयोग करके पहले भी फहीजत कर दी थी। और अरविन्द केजरीवाल भी देश के सांसदों को 'चोर', लुटेरे और हत्यारे की संज्ञा देकर काफी बदनामी करा चुके हैं.
     अण्णा हजारे कई बार अनशन कर चुके हैं। कई बार अपनी बात को भी मनवा चुके हैं। कई लोगों की बात भी मानते हैं। लेकिन मेरी बात न मानते हैं, न ही सुनते हैं। सरकार भले ही झूठे आश्वासन देकर अनशन तुड़वा देती है लेकिन उनकी टीम तो कहीं का न छोड़ेगी। इसलिए मेरी बात मान लें तो अच्छा है। कब से चिल्ला रहा हूं कि...भ्रष्टाचार हमारी रग-रग में समा चुका है। देश आज नहीं तो कल सुधर ही जाएगा। लेकिन पहले अपनी टीम को ही सुधार लो....।

Wednesday, April 18, 2012

अपमान हुआ तो क्या हुआ... सम्मान तो हुआ

            बहस करना अच्छी बात है। बेकार की बहस यानी बेकार की बात। इसलिए बेकार की बहस कभी नहीं करना चाहिए। लेकिन हमारे पड़ौसी गुप्ता जी हैं कि मानते ही नहीं। सुबह-सुबह घर आ गए। पूछने लगे, न्यूयार्क जाना है कितना समय लगेगा। मैंने उनको बताया कि न्यूयार्क भारत से 12 हजार से अधिक किलो मीटर दूर है। हवाई यात्रा होती है। 12 घण्टे तो लगते ही होंगे। हां! शाहरूख खान के साथ जाओगे तो 2 घण्टे एक्स्ट्रा जोड़ लेना। अमेरिका वाले शाहरूख की जबरदस्त तलाशी लेते हैं। मुझे तो लगता है कि शाहरूख को अमेरिका जाना ही नहीं चाहिए।
          बस क्या था, शुरू हो गई बहस। गुप्ता जी बोले, हां आप तो ऐसा बोल सकते हो, क्योंकि शाहरूख के बारे में कुछ जानते ही नहीं। शाहरूख को अमेरिका क्यों नहीं जाना चाहिए? उनको वहां सम्मान मिलने वाला था। सम्मान, सम्मान होता है। चाहे इसके लिए अपमान होना हो तो हो जाए। क्या पता ''कल हो न हो''। वैसे भी अपमान को कौन याद रखता है, सम्मान तो हमेशा याद रखे जाते हैं। आप तो जानते ही नहीं इस ''बाजीगर'' को कितने सम्मान मिल चुके हैं।
         ''ओम शांति ओम'' करते-करते शाहरूख 14 फिल्मफेयर और 8  बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार जीतकर ''बादशाह'' बन चुके हैं। सिनेमा में उनके योगदान के लिए हमने उन्हें 2005 में पद्श्री भी प्रदान किया। लेकिन इतने सम्मानों से क्या होता है! हमें तो अमेरिका का भी सम्मान चाहिए। अब आपको क्या मालूम, अमेरिका के येल विश्वविद्यालय पहुंचने से पहले शाहरूख की तलाशी तो हुई लेकिन इसी विश्वविद्यालय में उन्हें विश्वविद्यालय का सर्वोच्च सम्मान ''चब फेलोशिप'' भी मिला था।
          आप देखना अब भूल जाएंगे कि अमेरिका में दो बार शाहरूख की जबदस्त तलाशी ली गई। सब भूल जाएंगे कि शाहरूख को कपड़े उतारकर तलाशी देना पड़ी। भाई साहब! ''कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है''। वैसे हमने इस घटना के बाद बहुत कुछ पाया भी है। अमेरिका ने शाहरूख का अपमान किया लेकिन शाहरूख को सम्मान मिला और हमें अमेरिका पर दबाव बनाने का मौका। आपने देखा नहीं क्या! हमारे विदेश मंत्री ने अमेरिका पर कितना दबाव बनाया। माफी तक मांगवा ली। वैसे अमेरिका पर हम दबाव कब बना पाते थे। लेकिन शाहरूख का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि वह बार-बार हमें ऐसा मौका देता है। भारतीय सम्मान कितने भी सम्मान से दिए जाएं कहां फर्क पड़ता है। हां! अपमान के बाद मिला सम्मान हमेशा याद रखा जाता है। इसलिए शाहरूख जितनी भी बार अमेरिका जाना चाहे जा सकते हैं। क्यों सही कहा न...।
          हां! गुप्ता जी आप सही कहते हैं। वैसे आप न्यूयार्क क्यों जा रहे हो? अरे! यह तो बताना ही भूल गया। न्यूयार्क में मुझे भी सम्मान मिलने वाला है। देखना मेरी भी तलाशी हुई तो सम्मान तो लेकर आऊंगा ही और माफी भी मंगवा लेंगे अमेरिका से.....।

Tuesday, April 10, 2012

हम और कितनी करें कार्रवाई साहब !

          
              अमेरिका की पत्रिका फोब्र्स यदि दुनिया के सबसे भोले आदमी का पता लगाए तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वह भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के सिवा कोई दूसरा हो ही नहीं सकता! वैसे तो उनके भोलेपन के कई किस्से देशवासियों ने सुने और देखे हैं लेकिन अभी हाल में जो देखा, वह उनके भोलेपन की गुणवत्ता को और अधिक बढ़ा देता है। लगता है वह भोलेबाबा बनने की कोशिश कर रहे हैं!
           भगवान भोलेनाथ भी भोले थे। लेकिन इतने भी नहीं थे कि गुस्सा न आए। उनकी जब तीसरी आंख खुलती थी तो सामने वाला राख हो जाता था। लेकिन हमारे भोलेबाबा की भी अच्छी भली दो आंखें हैं। लेकिन परेशानी यह है कि यह हमेशा बंद रहती हैं। जब हमारे देश में अरुणाचल प्रदेश की जमीन पर कब्जा करने वाले चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ आते हैं  तब भी और देश में आतंकवादी हमले कराने वाले पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी आते हैं, तब भी।
             हमारे प्रधानमंत्री के भोलेपन के बारे में राष्ट्रपति जरदारी भी पहले नहीं जानते थे। लेकिन भारत आने पर नई दिल्ली में चालीस मिनट तक चर्चा के बाद उन्हें भी समझ में आ गया। राष्ट्रपति जरदारी ने जब उनसे भारत और पाकिस्तान के संबंध मधुर बनाने की बात कही तब प्रधानमंत्री ने भी उतनी ही मधुरता से जवाब दिया कि 'आप दुश्मनों पर कार्रवाई करो तभी दोस्ती होगी।' उनकी इस बात जरदारी जयपुर से पाकिस्तान जाने तक मुस्कुराते रहे।
               हालांकि मैं उस बैठक में नहीं था। लेकिन जिस प्रकार जरदारी मुस्कुरा रहे थे जो उसको देखकर यह जरूर कह सकता हूं कि प्रधानमंत्री की इस बात पर जरदारी ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा होगा कि- मनमोहन सिंह जी आप बड़े ही भोले हैं। क्या आपको अभी भी नहीं पता कि हम दुश्मनों के खिलाफ कितनी कार्रवाई करते हैं।
             पाकिस्तान तो अपने दुश्मन के खिलाफ हमेशा कार्रवाई करता रहा है। अब आप ही देख लो हमने अपने आतंकवादियों द्वारा आपकी संसद को निशाना बनाया। मुम्बई में 26  नवम्बर 2008  को कसाब जैसे आतंकवादी की टोली भेजी थी! आप भूल गए क्या पिछले वर्ष 7 सितम्बर 2011 को हमने संसद से मात्र डेढ़ किलो मीटर दूर दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर धमाका करके 15 लोगों को मारा था।  अरे यह तो पता होगा कि 13 जुलाई 2011 को मुम्बई में श्रृंखलाबद्ध धमाके कर 21 लोगों को मारा तथा 131 लोगों को घायल किया था। आपकी धार्मिक नगरी वारणासी पर भी हमने 7 सितम्बर 2010 को हमला किया था। भूल गए क्या? इस धमाके में एक बच्ची की मौत हुई थी और 25 लोग घायल हुए थे। हमारी कार्रवाई का अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि हमने अपने आतंकवादी भेजकर मुम्बई, दिल्ली, अजमेर, हैदराबाद, जयपुर, अहमदाबाद, बंगलौर, वाराणासी, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, असम और मालेगांव और न जाने कहां कहां धमाके कराए हैं।
              आपके सख्त गृहमंत्री पी. चिदंबरम के कार्यकाल में ही चार वर्ष में हमने आठ बड़े आतंकवादी हमले किए। इसमें हमने 50 से ज्यादा लोगों  को भी मौत के घाट उतारा है।
             अरे मनमोहन जी अब तो आप विश्वास करिए न, कि हम दुश्मनों के खिलाफ कितनी कार्रवाई करते हैं। अब आप ही बताइए हम और कितनी कार्रवाई करें? और आप तो हमारी छोडि़ए अपनी बताइए। आपने अपने दुश्मनों पर कितनी कार्रवाइयां की हैं। आपने तो अफजल और कसाब को  अभी तक पाल पोस रहे हैं। आप तो कुछ कार्रवाई करते नहीं हो और हमसे कह रहे हो। चलो छोड़ो...अब तो दोस्त बन जाइए!

Monday, April 2, 2012

मुँहवाद कराने वाले मुहावरे



           आज हिन्दी की मैडम की बहुत याद आ रही है। उनकी याद आने का कारण यह है कि उन्होंने मुहावरों का प्रयोग करना तो बता दिया लेकिन इनका प्रयोग कहां करना है और कहां नहीं करना है, यह नहीं बताया! मुझे लगता है कि टीम अण्णा के सदस्य मनीष सिसौदिया की मैडम ने भी उन्हें ठीक ढंग से मुहावरों का प्रयोग करना नहीं सिखाया। अगर सिखाया होता तो वह कभी भी संघर्षशील, लग्नशील जैसे राजनेता शरद यादव के लिए 'चोर की दाढ़ी में तिनका' वाले मुहावरे का प्रयोग नहीं करते!
            इस एक मुहावरे के कारण संसद में सांसदों ने कितना हो हल्ला किया यह हमने देखा। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रयाद यादव, संजय निरुपम, सुषमा स्वराज जैसे लगभग सभी सांसदों ने इस मुहावरे पर काफी गुस्सा किया। गुस्सा व्यक्त कर टीम अण्णा को चेतावनी दी गई कि वे संसद और सांसदों की मर्यादाओं का सम्मान करें।
           देश में तरह-तरह के कानून बनाने वाले इन नेताओं की चेतावनी को हवा में नहीं उड़ाना चाहिए। भोलीभाली जनता को सावधान रहने की जरूरत है। इसलिए आप भी सावधान हो जाइए। मैं भी हो चुका हूं। टीम अण्णा के सदस्य मनीष सिसौदिया से यही कहना है कि अब वे कभी भी 'चोर की दाढ़ी में तिनका' वाले मुहावरे का प्रयोग न ही करें तो अच्छा है। इस मुहावरे के प्रयोग से हमारे सांसदों का अपमान होता है।
          लेकिन मनीष सिसौदिया को भी निराश होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि 'चोर' शब्द का मुहावरा एक ही थोड़े ही है। हमारे पास तो ऐसे ढेरों मुहावरे और लोकोत्तियां हैं जिनका प्रयोग होते हमने कई बार अनुभव भी किया है और देखा भी है।
           इसी प्रकार एक और मुहावरा है- 'चोर-चोर मौसेरे भाई'। इस मुहावरे का अर्थ होता है कि दो चोर एक दूसरे के भाई जैसे होते हैं। ठीक  उसी प्रकार जिस प्रकार संसद में सभी भाई-बहन की तरह इकट्ठा हो गए थे और इकट्ठा होकर टीम अण्णा के खिलाफ संसद की गरिमा को याद दिला रहे थे। लेकिन संसद की गरिमा उस वक्त कहां जाती है जब सांसद एक-दूसरे के प्रति अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं, कुर्सियां और माइक तोड़ा जाता है। लोकसभा की आसंदी को घेरा जाता है।
           अगला मुहावरा 'उल्टा चोर कोतवाल को डांटे' भी है। अब देखो न, एक तो कालाधन वापस नहीं ला रहे, भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल बिल नहीं ला रहे, आतंकवादियों से सुरक्षा नहीं हो रही, महंगाई पर अंकुश नहीं है, बल्कि उल्टा जनता को ही सबक सिखाया जा रहा है। विरोध करने पर लाठियों से पीटा जा रहा है।
          'चोरी और सीना जोरी' भी इसी तरह का एक मुहावरा है। एक तो देश में इतने बड़े-बड़े घोटाले हो रहे हैं दूसरी ओर जो घोटालों को उजागर कर रहे हैं उन्हें ही मुल्जिम की तरह संसद में लाने की बात हो रही है। यह कैसे चलेगा? यह तो 'चोरी और सीना जोरी' ही हुई ना?
          चोर कहीं भी रह सकता है। एक चोर ऐसा भी होता है जो दिल में रहता है तब उसे कहा जाता है 'दिल में चोर होना'। हम जानते हैं कि हमारे सांसद जनलोकपाल बिल और कालाधान वापस लाने में इतनी उदासीनता क्यों बरत रहे हैं। क्योंकि उनके लिए भी दिल में एक चोर बैठा है, जो कब भागेगा पता नहीं।
दोषी व्यक्ति अपने आप फंस जाता है। जब इस बात को कहना हो तो कहते हैं 'चोर के पैर पोले' मुहावरे का प्रयोग किया जाता है। कई बार देखने में आता है कि सुरेश कलमाड़ी, ए.राजा जैसे नेता जेल की हवा खा चुके हैं, अगर इनके पैर पोले नहीं होते तो कितना अच्छा होता।
          इसी प्रकार कई और मुहावरें और लोकोत्तियां भी हैं जिनका प्रयोग भी हम कभी भी कर सकते हैं। जैसे- 'चोर चोरी से जाए-हेरा फेरी से न जाए','चोरी का धन मोरी में', 'ककड़ी के चोर को फांसी नहीं दी जाती' और धोबी के घर पड़े चोर, वह न लुटा लुटे और
           अब सोच रहा हूं कि हिन्दी वाली मैडम मिल जाएं तो एक बार पूछ लूं कि क्या इन 'चोर' शब्द वाले मुहावरों का प्रयोग हम सार्वजनिक मंच पर कर सकते हैं? इन मुहावरों से हमारे देश के कर्णधारों के दिल पर, दिमाग पर ठेस तो नहीं पहुंचेगी। कहीं हमारे संर्घषशील, जुझारू, विद्वान राजनेता नाराज तो नहीं हो जाएंगे। मैं तो मैडम को ढूंढऩे की कोशिश कर ही रहा हूं, अगर आपको मिल जाएं तो कृपया पूछकर मुझे अवश्य बताएं।


Tuesday, March 27, 2012

मत करो रेखा से छेड़छाड़

      हम 121 करोड़ हो गए हैं। लेकिन दिमाग एक के पास भी नहीं है।  जब योजना आयोग में योजना बनाने वालों के पास ही यह तत्व उपलब्ध नहीं तो मेरे और आपके पास कितना होगा, समझ सकते हैं। दिमाग होता तो वे रेखा से छेड़छाड़ नहीं करते। पूरी दुनिया जानती है कि जिसने भी रेखा से छेड़ाछाड़ की है, उसका बड़ा बुरा हश्र हुआ है।
      यह बात कहने के मेरे पास प्रमाण भी हैं। इसलिए जिस बुरे हश्र की बात कर रहा हूं, उसे समझने के लिए हमें रेखा के बारे में विस्तार से जानना होगा। रेखा कई प्रकार की होती हैं। जिनके बारे में मैं जानता हूं वह छह प्रकार की हैं। गरीबी रेखा, गणितीय रेखा, फिल्म अभिनेत्री रेखा, सीमा रेखा,हस्त रेखा और लक्ष्मण रेखा। इन रेखाओं को जिन्होंने भी छेड़ा है वह कभी भी सुखी नहीं रहा। कुछ का तो अंत ही हो गया।
       पहले गरीबी रेखा की बात करते हैं। योजना आयोग में काम करने वालों को पता नहीं कौन सा भूत सवार हो जाता है कि वह बार-बार इस रेखा से छेड़छाड़ करते हैं। भारत की 70 फीसदी आबादी गरीब है, जो बिल्कुल शांति से अपना जीवन गुजार रही है। लेकिन ये योजना बनाने वाले  कुछ न कुछ परेशानी खड़ी करते रहते हैं। गांव में 26 रुपए और शहर में 32 रुपए रोजाना कमाने वाल गरीब नहीं हो सकता। अब मुझे एक बात आज तक समझमें नहीं आती कि जब 26 रुपए और 32 रुपए कमाने वाले व्यक्ति गरीब नहीं है तो वह लोग कितने गरीब हैं जो सरकार और ऊंचे पदों पर बैठे करोड़ों खा रहे हैं!! सरकार ने गरीबी रेखा को छेडक़र अच्छा नहीं किया। पूरे भारत में थू-थू हो रही है!
          दूसरी रेखा है गणितीय रेखा। इस रेखा से छेड़छाड़ करने पर स्कूल में बच्चे कितने पिटते हैं सबको पता है। जब भी रेखा को थोड़ा सा आढ़ा -तिरछा बनाया तो गाल पर एक ऐसा तमाचा पड़ता था कि मैडम के हाथों की रेखा छप जाती थीं।
       फिल्मी अभिनेत्री रेखा तीसरी रेखा है। फिल्मों में हमने कई बार देखा है। जब कोई गुंडा रेखा से छेड़छाड़ करता तो फिल्म का नायक उसकी कितनी धुनाई करता है। गुंडे की इतनी पिटाई होती थी कि वह हमेशा के लिए सुधर जाता था।
        इसी प्रकार हस्त रेखा भी है। हां इस रेखा को समझना आसान नहीं है। केवल ज्योतिषियों को यह अधिकार है। यह हस्त रेखा भगवान बनाता है। जिस किसी व्यक्ति के हाथों की रेखा ठीक नहीं होती, उस व्यक्ति की जिंदगी भी ठीक नहीं होती।
       पांचवी रेखा है सीमा रेखा। पाकिस्तान ने कितनी बार इस रेखा को छेडऩे की कोशिश की! हमारे सैनिकों ने क्या हाल किया यह सबको पता है। सीमा रेखा के छेडऩे पर हमने कई बार पाकिस्तान को धूल चटाई है। इस रेखा के कारण कई बार युद्ध हो चुके हैं।
        अंत में लक्ष्मण रेखा। यह रेखा बड़ी खतरनाक है। दुष्ट राक्षस रावण ने माता सीता को इस रेखा से बाहर निकाला और अपहरण कर ले गया था। इसके बाद सभी जानते हैं कि भगवान श्रीराम ने दुष्ट रावण किस प्रकार अंत किया था।
        तो कुल मिलाकर कहने का आशय यह है कि रेखा से छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए। गरीबों को लक्ष्मण रेखा के भीतर ही रहने दो तो अच्छा है। वरना गरीब लक्ष्मण रेखा के पार आ गए तो आपका ही सत्यानाश कर देंगे!   आपका भी वही हश्र हो सकता है जो दुष्ट राक्षस रावण का हुआ था! गरीब आदमी यदि अमीर हो गए तो आपको वोट कौन देगा? वोट नहीं मिलेंगे तो सोच लो कुर्सी भी जा सकती है.....!

Tuesday, March 20, 2012

छुक-छुक से पीछा छूटा

        अच्छा हुआ छुक-छुक मंत्री ने इस्तीफा दे दिया। इस जमाने में जब राजधानियां और शताब्दी जैसी गाडिय़ां दौड़ रही हैं ऐसे में इनकी छुक-छुक को कौन सुनता? इनकी छुक-छुक से सभी की धकडऩे धक-धक कर रही थीं। साहब डाँट ही नहीं खा रहे थे। जबसे रेल मंत्री बने तब से संभालना ही मुश्किल हो रहा था। ममता बनर्जी ने कितनी ममता से इन्हें मंत्री बनाया था। लेकिन जब रेल बजट दिया तो ममता भी छीन ली। सीधे इस्तीफा ही मांग लिया। सच बताऊं  तो मुझे भी यह मंत्री पसंद नहीं आए। खासतौर पर जब, जब इन्होंने रेल बजट प्रस्तुत किया।
      रेल बजट भी ऐसा जैसे हड़प्पा की खुदाई से निकाला हो। हमारे देश में जहां करोड़ों-लाखों रूपए की बातें होती हैं, घोटाले होते हैं, ऐसे में 2 पैसे, 5 पैसे को कौन जानता है। अब देखो न किलोमीटर के हिसाब से किराया बढ़ाया है। सामान्य श्रेणी में प्रतिकिलोमीटर 2 पैसे, स्लीपर में 5 पैसे, थर्ड एसी में 10 पैसे, सेकण्ड एसी में 15 और 20 पैसे एवं फस्र्ट एसी में 30 पैसे बढ़ाए हैं। सरकार में जहां करोड़ों की बात होती है वहां से पैसे में बात कर रहे हैं साहब। इनसे पहले वाले मंत्री अच्छे थे जिनका ध्यान पैसों पर नहीं करोड़ों पर रहता था। जेल में बंद पहले वाले संचार मंत्री ए.राजा को ही देख लो, पूरे 1 लाख 76  करोड़ का घोटाला करके बैठे हैं! कमलाड़ी को देखो राष्ट्रमण्डल खेल कराते-कराते 8  हजार करोड़ का ही खेल कर दिया! महाराष्ट्र के पुराने मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने सेना के अधिकारियों की विधवाओं के घर बनाते-बनाते 176  हजार करोड़ का घोटाला किया।
        जिस देश में करोड़ों की बातें होती हों ऐसे में 2 पैसे, 5 पैसे वाले मंत्री को तुरंत हटा ही देना चाहिए था। इनके इस्तीफे 5 दिन लग गए, मैं सरकार में होता तो इनकी स्पीड को देखते हुए पहले ही इस्तीफा ले लेता।  अभी भी छुक-छुक की तरह ही दौड़ रहे हैं। आजकल रेलगाडिय़ां कोयले से नहीं डीजल और बिजली से दौड़ रही हैं।
एक बात और जो मंत्री को नहीं बोलना चाहिए थी। मंत्री जी कह रहे हैं कि भारतीय रेलवे घाटे में जा रही है। हम कितने फटीचर हैं, यह दूसरों को बताने की जरूरत क्या है। एक ओर तो हम कह रहे हैं कि विदेशों में हमारा 25 लाख करोड़ रुपया कालेधन के रूप में जमा है। हम विश्वबैंक का कर्जा तीन बार चुका सकते हैं, ऐसे में बार-बार क्या रोना चाहिए। ऐसा करने से विश्व की नजरों में भारत की इमेज खराब होती है। ऐसा करेंगे तो विश्व की नजरों में हम सबसे बड़े गप्पेबाज साबित होंगे।
       सच पूछो तो मुझे याद भी नहीं है कि मैंने 5 पैसे और 10 पैसे आखिरी बार कब देखे थे। हमारे बच्चे ही हमसे पूछरहे हैं कि ये 5 पैसे कैसे होते हैं? नए किस्म के बच्चों ने तो अभी तक इन सिक्कों को किस्सों में ही सुना है। नए जमाने में पुराने जमाने की बात करने वाले मंत्री से सबसे अधिक परेशानी बच्चों को ही हो रही थी। मंत्री जी 5 रुपए और 10 रुपए का किराया बढ़ाते तो शायद इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन 2 पैसे, 5 पैसे का हिसाब कैसे लगाया जाता है, यह अब किसी भी स्कूल में नहीं सिखाया जाता। रेल बजट के बाद नए बच्चे आज तक हिसाब नहीं लगा पाए हैं कि ग्वालियर से भोपाल जाने में कितने पैसे बढ़ेंगे? इसलिए अच्छा हुआ इन छुक-छुक महोदय से पीछा छूटा। लेकिन मुझे आज भी चिंता हो रही है। क्योंकि मैंने सुना है कि नया रेल मंत्री भी इन्हीं की पार्टी का रहने वाला है। अब तो चिंता हो रही है कि कहीं वह भी चवन्नी, अठन्नी वाली बात न कर दे, नहीं तो हमारी तो नाक ही कट जाएगी।

Tuesday, March 13, 2012

आला रे आला अखिलेश आला



आला रे आला अखिलेश आला
राहुल की किस्मत पर लगा ताला
हाथी को कुचलकर दिखाया दम
हार गया प्रत्याशी भाजपा वाला
आला रे आला अखिलेश आला.....

लैपटॉप मिलेगा और आरक्षण भी
बड़े अपराधियों को संरक्षण भी
प्रदेश दौड़ेगा प्रगति की राह पर
चौबीस घण्टे खुलेंगी मधुशाला
आला रे आला अखिलेश आला.....

मुख्यमंत्री की कुर्सी से पटका
माया की माया को लगा झटका
मूर्तियों पर भी होगी राजनीति
अब होगा पुतला साइकिल वाला 
आला रे आला अखिलेश आला.....

आजम, शिवपाल ने चुप्पी साधी
झूठी हंसी अपने चेहरे पर लादी
राजनीति का जनता ने ढंग देखा
बाप ने छोड़ा पद मुख्यमंत्री वाला
आला रे आला अखिलेश आला.....

सुमित 'सुजान' ग्वालियर

मेरी दुर्दशा की भी तो जिम्मेदारी लो.....

क्यों भाई आम आदमी! क्यों दु:खी हो? घर नहीं जाओगे क्या? या यूं ही रास्ते पर पड़े रहोगे।
अब घर जाकर क्या करेंगे साहब!! अब कोई बचा ही नहीं जो हमारी दुर्दशा की जिम्मेदारी ले।
क्या मतलब है तुम्हारा?
अरे साहब मतलब पूछ रहे हो! पहले तो हम सोचते थे कि हमारी दुर्दशा को ठीक करने के लिए सभी बड़े चिंतित हो रहे हैं। कोई हमें आरक्षण दिलाने के लिए अड़ा था तो कोई लैपटॉप देने के लिए। लेकिन अब देखो न चुनाव निपट गए हैं तो हमें खाने को रोटी नहीं है, पहनने को सिर्फ एक धोती है और बनियान है। कोई काम-धंधा नहीं है। पूरा जीवन गरीबी में कटा जा रहा है। चुनाव चल रहे थे तब हम नेताओं के माईबाप थे। चुनाव निपटने के बाद सबके-सब मुझसे अलग हो गए।
ठीक-ठीक बताओ तुम कहना क्या चाहते हो आम आदमी?
चलिए आप ज्यादा जोर देकर पूछ रहे हैं तो बता देता हूं।
उत्तर प्रदेश में अभी विधानसभा चुनाव हुए। चुनाव में समाजवादी पार्टी जीत गई। बाकी सभी पार्टियां हार गईं। जब चुनाव हो रहे थे तब जो भी नेता हमारे घर पर आया, हमारी गरीबी को हमसे दूर करने की बात करता रहा। लेकिन चुनाव होने के बाद हम इतने दूर हो गए कि हमें याद भी नहीं किया जा रहा है। सभी बता रहे थे कि मतदान करना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी वाला काम है। जो  देश का जिम्मेदार व्यक्ति होता है वह मतदान जरूर करता है। जिम्मेदार व्यक्ति ही देश की राजनीति  में बदलाव ला सकता है। जिम्मेदार व्यक्ति ही महंगाई का विरोध करता है, काला धन वापस लाने की मांग करता है, भ्रष्टाचार के खिलाफ आगे आता है। देश का जिम्मेदार व्यक्ति वही होता है जो अपने परिवार को नहीं बल्कि अपने देश को देखता है। इसलिए देश में स्वच्छ राजनीति चाहते हो तो जिम्मेदारी से मतदान करो। इतना बड़ा पाठ पढ़ाया था हमें नेताओं ने।
मैंने जब उनसे पूछा कि मुझे क्या मिलेगा तो कहने लगे कि तुम हमें वोट करो, हम तुम्हारी जिम्मेदारी लेंगे। मतदान से पहले सभी ने मेरे उत्थान की जिम्मेदारी ली। लेकिन चुनाव निपटने के बाद सब भूल गए।
उत्तर प्रदेश और पंजाब में हुए विधानसभा चुनाव के बाद मैं (आम आदमी)बड़ा दु:खी हूं। कांग्रेस को मिली हार के लिए कांग्रेस के युवराज कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में हार की जिम्मेदारी मेरी है, कांग्रेस नेत्री रीता बहुगुणा जोशी कह रही हैं कि हार की जिम्मेदारी मेरी है। देश के सबसे समझदार व्यक्ति दिग्विजय सिंह कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में हार के लिए मैं गुनहगार हूं।
प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती कह रही हैं कि उनकी हार के लिए भाजपा और कांग्रेस जिम्मेदार हैं। भाजपा की फायर ब्रांड नेता उमा भारती कह रही हैं कि प्रदेश में भाजपा की हार की जिम्मेदारी मेरी है। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही जो खुद इस चुनाव में हार गए, वह कह रहे हैं कि हार की जिम्मेदारी मेरी है। इसी प्रकार पंजाब में मिली हार के बाद कांग्रेस के नेता कै. अमरिंदर सिंह कह रहे हैं कि हार की जिम्मेदारी मेरी है।
अब देखो न बाबू, सभी नेता चुनाव में हुई पार्टी की दुर्दशा को देखते ही कैसे जिम्मेदारी लेने आ गए!! काश! ये राजनेता देश में बढ़ती महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद को न रोक पाना, कानून व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवा की बिगड़ती स्थिति के लिए भी ऐसे ही जिम्मेदारी लेने की हिम्मत जुटाते तो कितना अच्छा होता। लेकिन कितनी बुरी बात है कि आजादी के 6 4 वर्ष बाद भी हम गरीबों को रोजगार नहीं है। रोजगार के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) जैसा कानून बनाना पड़ता है। 100 दिन का रोजगार मिलता है, पूरे साल भर का गुजारा करना पड़ता है। हम गरीब है न इसलिए हमारी जिम्मेदारी कौन लेगा। ये कैसा लोकतंत्र है जिसमें कोई भी मेरी इस दुर्दशा की जिम्मेदारी ही लेने को तैयार नहीं है...। सबके सब मतलबी निकले..! काश! मैं भी मतलबी होता....!!

Tuesday, March 6, 2012

कांग्रेसी होली.....


मेहनत तो की थी जमकर
लेकिन नतीजे मिले जब ढीले
सोनिया गांधी लाल हो गईं
राहुल हो गए पीले।।

राहुल हो गए पीले
रंग सबका उड़ा हुआ है
दिग्विजय सिंह ने तो
10 दिन से खाना नहीं छुआ है
प्राण सूख गए उनके
और नयन हो गए गीले
सोनिया गांधी लाल हो गईं
राहुल हो गए पीले।।

चुनावों से अब सभी
बहुत डर रहे हैं
अन्ना और रामदेव भी
लुटिया डुबो रहे हैं
सुब्रण्यम भी हो रहे हैं चुटीले
सोनिया गांधी लाल हो गईं
राहुल हो गए पीले।।

बहुत हो गए रोड शो
होली में अब तो नए रंग
और नई उमंग भर लो
कुछ जनता के लिए भी कर लो
नहीं तो जनता ठोकेगी अंतिम कीले
सोनिया गांधी लाल हो गईं
राहुल हो गए पीले।।

Monday, March 5, 2012

लेटने में लेट नहीं होना....

              यार अब तो यहां जीना मुश्किल हो गया है। अब देखो न गाड़ी चलाने का कानून भी कड़ा कर दिया है। कानून तो कानून होता है। देश की जितनी जनसंख्या नहीं है उससे ज्यादा तो कम्बख्त कानून हो गए हैं! आत्महत्या करके परलोक पहुंच जाओ तब भी पुलिस वाले आत्महत्या का मुकदमा दर्ज कर लेते हैं। मोटर वाहन कानून को इतना कड़ा कर दिया है कि बेचारी जनता घबराई हुई है। लेकिन जनता को घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि मैंने भी इस कानून का अध्ययन कर लिया है। कानून तो मजेदार कानून है। जनता चाहे तो इससे अपनी गरीबी दूर कर सकती है! ये तो गरीबों को अमीर बनाने वाला कानून है!!
             नया कानून है। नया-नया जोश है। नए कानून में गाड़ी चलाते समय मोबाइल पर बात नहीं करना, शराब नहीं पीना, अधिक सवारी नहीं बैठाने के लिए कहा गया है। शराब पीकर गाड़ी चलाई तो 2 हजार से 10 हजार रुपये तक जुर्माना हो सकता है। 6 महीने की जेल भी हो सकती है। मोबाइल पर बात करते हुए पकड़े गए तो पहली बार में 500 रुपए उसके बाद 2 हजार से 5 हजार रुपए तक भरने पड़ सकते हैं। गाड़ी चलाते वक्ते मोबाइल पर मैसेज भेजते हुए पकड़े गए तो सजा हो सकती है।
            अंतर्राष्ट्रीय सडक़ महासंघ की रिपोर्ट के अनुसार सडक़ दुर्घटनाओं के कारण भारत को हर साल 1 लाख करोड़ का नुकसान उठाना पड़ता है। वहीं कम्युनिटी अगेंस्ट डे्रकन की रिपोर्ट के अनुसार हर एक घण्टे में 56 सडक़ दुर्घटना होती हैं और लगभग 14 लोग रोजाना मरते हैं। इनमें से सबसे अधिक मौतें नशा करने वालों के साथ होती हैं। ये बातें सब सही हैं। डराने वाली बातें हैं। लेकिन आप लोगों को डरने की जरूरत नहीं है। क्योंकि मेरा अध्ययन आपको फायदे की बात करता है।
           अध्ययन करने पर पता चला है कि सरकार ने नए कानून में मरने वालों के परिजनों को एक लाख रुपये देने का वादा किया है। यदि गंभीर रूप से घायल हो जाओगे तो 50 हजार रुपये मिलेंगे। यदि यह मान लें कि रोजाना 14 लोग मरते हैं तो सरकार को मारे गए लोगों के परिजनों को 1 लाख रुपए मुआवजे के हिसाब से 51 करोड़ देना पड़ते हैं। घायलों का मामला अलग है। अपुन जिस अध्ययन की बात कह रहे हैं वह आपके घायल होने पर है। कानून में है कि घायल हुए तो सरकार 50 हजार रुपये देगी। इसलिए मित्रों कोई व्यक्ति घायल होने की हिम्मत कर ले तो सरकार की तरफ से उसे 50 हजार मिल जाएंगे। घायल हो जाओ, 50 हजार पाओ फिर ठीक हो जाओ, फिर घायल हो जाओ। इसलिए नये कानून को पढक़र तो मेरा मन घबरा नहीं रहा है बल्कि सोच रहा हूं कि कोई अच्छी सी तारीख देखकर सडक़ पर लेट जाऊं। कमबख्त एक चिंता यह भी सता रही है कि कहीं मैं लेटने में लेट नहीं हो जाऊं। यदि सरकार को मेरा अध्ययन का पता चल गया तो पता नहीं कब नया कानून बना दे! खैर! आपको पता चल जाए तो प्लीज सरकार को मत बताना।