Wednesday, August 8, 2012

दल गठन में शक्ति है...

          
         दिल्ली से लौट रहा था। मेरी सामने वाली सीट पर हमारे पड़ौसी रामदीन जी मिल गए। रामदीन जी सीधे-सादे इंसान हैं ऐसा दिखने के लिए उन्होंने अपना हुलिया भी बनाया हुआ था। सफेद खादी का कुर्ता, पैरों में हवाई चप्पल और सर पर गांधी टोपी जिस पर लिखा था मैं अण्णा। उनके हुलिए को देखकर यह समझने में देर नहीं लगी कि वह जंतर-मंतर अण्णा हजारे के अनशन से आ रहे हैं। अनशन समाप्ति की घोषणा के बाद वे वापस लौट रहे थे। उनके द्वारा मुझे पहचानते ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ कि चलो सफर अच्छा कट जाएगा।
         वैसे तो मैंने कभी भी रामदीन जी को गुस्सा होते हुए नहीं देखा लेकिन मुझे नहीं पता था कि मेरी एक चुटकी से वह इतना उखड़ जाएंगे। मैंने मजाक में उनसे कहा ''लो अब भ्रष्टाचार की समस्या को समाप्त करने के लिए नई पार्टी बनेगी। हम वैसे ही नेताओं से परेशान हैं और अण्णा हजारे ने भी नई पार्टी बनाने की घोषणा कर दी।''  इस बात पर वह एकदम नाराज हो गए। तपाक से बोले! ''देखो साहब यह तो भारत का इतिहास रहा है कि पार्टी या संगठन के बिना किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। वैसे भी हमारे यहां तो कहावत भी है कि 'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।' हमने अंग्रजों से भारत को आजाद कराने के लिए भी तो कई दल बनाए थे। अब समय बदल गया है बाबूजी। पहले कहा जाता था-'संगठन में शक्ति है'। लेकिन अब नई सोच ने जन्म लिया है। इसलिए नई सोच पर चलो और यह मान लो कि 'दल गठन में शक्ति है।'
           रामदीन जी के प्रभावी प्रवचन सुनते ही मेरे दिमाग ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। दिमाग में आइडिया आया कि जिस प्रकार अण्णा हजारे ने भ्रष्टाचर की समस्या के समाधान के लिए नई पार्टी बनाने की घोषणा की है तो क्यूं न अन्य समस्याओं को दूर करने के लिए भी दल बनाए जाएं। मैंने इस कल्पना को रामदीन जी के सामने रखा तो उन्होंने भी शाबाशी देकर मेरा हौंसला बढ़ाया।
          कल्पना कुछ इस प्रकार है कि भारत में जो भी प्रमुख समस्याएं हैं उनको समाप्त करने के लिए लोग आगे आएं और नया दल बनाएं। उदाहरण के लिए बेरोजगारी। इस समस्या के समाधान के लिए पूरे देश के युवा एक पार्टी का निर्माण कर सकते हैं। उनकी पार्टी का नाम आरबीएस अर्थात् राष्ट्रवादी बेरोजगार सेना हो सकता है। इसी प्रकार नक्सली अपनी बात मनवाने के लिए एनडी (यू) अर्थात् नक्सली दल (यूनाइटेड) का गठन कर सकते हैं। नक्सलियों की समस्याएं खत्म होंगी तभी नक्सवाद की समस्या का समाधान हो सकता है। आतंकवाद भी भारत में एक बड़ी समस्या है। इसलिए जिन परिवारों के लोगों ने अपना बलिदान आतंकी घटनाओं में दिया है वह सब मिलकर एव्हीडी (आतंकवादी विरोधी दल) बना सकते हैं। गैस पीडि़त जीपीपी (गैस पीडि़त पार्टी), आरक्षण मांगने वाले आरडीडी (आरक्षण दिलाओ दल), भुखमरी दूर करने के लिए बीएमएम (भुखमरी मुक्ति मोर्चा), गरीबी की समस्या दूर करने के लिए गरीब जनता जीपीएच (गरीब पार्टी ऑफ हिन्दुस्तान)जैसी नई पार्टी बना सकते हैं।
          जिस प्रकार टीम अण्णा ने तैयारी कर ली है, इसी प्रकार सबको कर लेनी चाहिए। चुनाव आने वाला है। हमें संसद का शुद्धिकरण भी तो करना है और भारत को समस्याओं से मुक्त भी। इसलिए रामदीन जी की तरह मैं भी मानने लगा हूं कि- 'दल गठन में शक्ति है।' जय हिन्द!

Tuesday, July 31, 2012

हमारे खेल, हमारा ओलंपिक

       
        आज स्कूल में रामदीन मस्साब हमसे काफी नाराज हो गए। वैसे उनकी नाराजगी का कारण भी सही ही था। बच्चों के सवालों का जवाब देते-देते समय का अंदाजा ही नहीं लगा। बातचीत में हम उनका पीरिएड भी खा गए। सब कम्बख्त राहुल की वजह से हुआ। न वह हमसे ओलंपिक के बारे में सवाल करता, न ही कुछ ऐसा होता।
        मैं क्लास से बाहर आने की तैयारी कर ही रहा था कि राहुल ने पूछ लिया ''सर... ये ओलंपिक क्या होता है? हम चीन, अमेरिका या अन्य देशों की तरह मैडल क्यों नहीं जीत पाते हैं?''
       पहले तो मैंने सभी बच्चों को ओलंपिक के बारे में बताया। इसके बाद दूसरे सवाल का जवाब दिया। मैंने कहा कि ''दरअसल हम ओलंपिक में इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि उसमें वह खेल ही शामिल नहीं हैं जिसमें भारतीयों को महारत हासिल है।  हमारे परंपरागत खेल तो अलग ही हैं।
       तभी विकास अपनी सीट से उठा और बोला- ''सर... फिर हमारे कौन-कौन से खेल हैं, उनके बारे में भी बताइए।'' अच्छा सवाल है विकास, मेरे मुंह से सहज ही निकल गया। तब मैंने बताया कि हमारे खेल वैसे तो कई सारे हैं लेकिन हम भारतीयों को जिनमें महारत हासिल है, वह खेल हैं भ्रष्टाचार, चापलूसी, दोगलेबाजी, ईर्ष्या, टांग खिंचाई। जिस दिन ये सारे खेल ओलंपिक में शामिल हो जाएंगे तब देखना ओलंपिक शुरू होते ही पहला स्वर्ण पदक हमें ही मिलेगा।
        भ्रष्टाचार की प्रतियोगिता में हम सुरेश कलमाड़ी, ए.राजा जैसे कुछ नेताओं को भेज देंगे तो अच्छे-अच्छों की छुट्टी हो जाएगी। वैसे मुझे लगता है कि हमने श्री कलमाड़ी को लंदन ओलंपिक में जाने से रोककर अच्छा नहीं किया। कलमाड़ी जी कोई न कोई तिकड़म भिड़ाकर तीरंदाज तिकड़ी को बाहर नहीं होने देते।
इसी प्रकार चापलूसी में हमारा कोई मुकाबला नहीं कर सकता। अभी हमारे देश में ऐसे कई लोग हैं जो सोनिया गांधी की चापलूसी कर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की जुगाड़ भिड़ा रहे हैं। अगर चापलूसी की प्रतियोगिता होने लगे तो सच मानिए तीनों तमगे हमारे ही नेता जीतकर लाएंगे। दोगलेबाजी में स्वामी अग्निवेश जैसे व्यक्तियों की भागीदारी ठीक रहेगी।
       हां! अगर ईष्र्या का मुकाबला होगा तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जैसे व्यक्ति ठीक रहेंगे। जिस तरह से आठ जिलों के नाम बदले गए हैं। अगर  ऐसा ओलंपिक में किया तो विरोधी खिलाडिय़ों के हुलिए बदल जाएंगे।
        कबड्डी में हम अभी विश्व चैम्पियन बने हैं। लेकिन हमारे इस खेल को ओलंपिक में सिर्फ इसलिए शामिल नहीं किया जाता है क्योंकि आयोजक अच्छी तरह से जानते हैं कि भारतीय कितनी अच्छी तरह से 'टांग खिंचाई' करना जानते हैं। एक बार जब हम किसी को पकड़ लेते हैं तो तब तक नहीं छोड़ते जब तक सामने वाले खिलाड़ी का दम नहीं फूल जाता। रोहित शेखर ने भी एन.डी. तिवारी को अपना पिता साबित कराकर ही दम लिया।
       इसलिए देखो बच्चो-''हमारे खेल बिल्कुल अलग ढंग के हैं। इसलिए हमारा ओलंपिक भी अलग ढंग का होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक मुझे लगता है कि हम ओलंपिक में चीन, अमेरिका जैसे देशों का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। जिस दिन हमारे ये सारे खेल ओलंपिक में शामिल हो जाएंगे फिर देखना स्वर्ण, रजत और कांस्य तीनों पदक हमारी झोली में ही होंगे। यह भी हो सकता है कि हम किसी भी देश को कोई मुकाबला जीतने ही न दें।''
 

Tuesday, July 24, 2012

किटकिट दूर करेगा क्रिकेट...

       
    थोड़ी सी भी समझदार पत्नी मिले तो जरा संभलकर रहना चाहिए। सुबह मैं पार्क में बैठा यही प्रवचन अपने कुछ साथियों को दे रहा था। एक  महाशय ने पूछ लिया क्यूं तो बात आगे बढ़ गई। मैंने बताया कि 'यार 10 दिन पहले मेरा पत्नी से सिर्फ इस बात के लिए झगड़ा हो गया था कि मैंने उसे मायके जाने से मना कर दिया।' सुबह से शाम तक बात ही नहीं की। पिछले 10 दिन तक कोई बात ही नहीं हुई। फिर कल ही बाजार गई और सब्जी भाजी के साथ एक बेट और बॉल ले आई। पहले तो मुझे लगा कि मिंकू के लिए बेट-बॉल लाई होगी, लेकिन उसने तो कमाल ही कर दिया।
           मैंने आश्चर्य से पूछा-'यह किसलिए'? तब उसने बताया कि-'यह बेट-बॉल हम दोनों के खेलने के लिए खरीदा है। उसने बताया कि मैंने सुना है कि क्रिकेट खेलने से कटु रिश्ते सुधर जाते हैं।' फिर मैंने प्रश्न किया-'यह तुमने कब सुना?', तब उसने बताया कि-कुछ ही दिन पहले ही तो निर्णय हुआ है कि भारत और पाकिस्तान के बीच पांच साल बाद एक श्रृंखला दिसम्बर महीने में भारत में खेली जाएगी। मुम्बई हमले के पांच साल बाद पाकिस्तान की टीम क्रिकेट टीम भारत खेलने आएगी।
           भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड जब इन दो देशों की कटु दुश्मनी को दोस्ती में बदलने के लिए क्रिकेट मैच करा सकता है तो हमारी बातचीत को तो अभी बंद हुए 10 दिन ही हुए हैं। पहले तो उसकी समझदारी पर मैं अपनी हंसी रोक नहीं सका, फिर मैंने उससे क्रिकेट खेलने से मना किया तो वह चिढ़ गई। पत्नी गुस्से से बोली- मैंने कौन सा मुम्बई हमले से भी बड़ा हमला कर दिया जो आप क्रिकेट खेलने के लिए मना कर रहे हो। उन आतंकवादियों ने 163 निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतारा था, और तो और हमारे कुछपुलिस और सेना के जवानों को शहीद कर दिया था, उसके बाद भी तो दोनों देशों के बीच मैच हो रहे हैं हेना...। तुम्हारे दिल में कौन सा देशभक्ति का जुनून सवार हो रहा है, इतना तो हमारे खिलाडिय़ों में भी नहीं है। आतंकवादी हमले के बाद भी देखो ना कैसे क्रिकेट खेलने के लिए तैयार हो गए हैं, एक ने भी मना नहीं किया।
           पत्नी का पारा और अधिक बढ़ता गया। कोई कुछ भी कहे, मुझे तो बीसीसीआई का यह निर्णय बहुत पसंद आया। फिर इतिहास पर आते हुए बोली- देखो यदि एक क्रिकेट मैच 1992 के समय हो जाता तो बाबरी विध्वंस का मामला भी शांति के साथ बैठकर सुलझा लेते। अब तो ऐसा लगता है कि अभी भी देर नहीं हुई है, नक्सलियों से भी बात होनी चाहिए। नक्सलियों की नाराजगी दूर करने के लिए, उनसे रिश्ते सुधारने के लिए भी सरकार को एक क्रिकेट मैच का आयोजन करना चाहिए।
        कश्मीर का मामला भी कई वर्षों से अटका हुआ है। इस मसले को भी क्रिकेट मैच द्वारा सुलझा लेना चाहिए। कांग्रेस के लिए ममता, शरद पवार, अण्णा हजारे, बाबा रामदेव, अरविंद केजरीवाल कई बार परेशानी खड़ी करते हैं। यहां तक की मोहम्मद अफजल, कसाब भी इतनी दिक्कत नहीं देते जितने ये लोग देते हैं। इसलिए सरकार को एक मैच इनसे भी फिक्स कर लेना चाहिए। इस मैच के बाद हो सकता है कालाधन, टू-जी स्पेक्ट्रम जैसे बड़े-बड़े मामलों को लोग भूल जाएं।
       मेरी पत्नी की समझदारी पर मेरे सभी साथी जोर-जोर से ठहाके मारकर हंसने लगे। मैंने कहा ज्यादा नहीं हंसिए, मुझे गुस्सा भी आ सकता है। तभी इतने में एक साथी बोला-'कोई बात नहीं, तुम गुस्सा होगे तो हम तुम्हारे साथ भी एक मैच खेल लेंगे...।'

Wednesday, July 18, 2012

मेरे भी तो फरमान सुन लो...


           कल ही कुछ गांव वाले सुबह-सुबह घर पर आ पहुंचे। पहले तो मुझे लगा कि कौन सी गलती हो गई जो यह टोली आ पहुंची। किसी के कंधे पर बंदूक है तो कोई लट्ठ थामे मेरे सामने सीना ताने खड़ा हो गया। इतने में एक पहलवान सा आदमी दोनों हाथ जोडक़र बोला-''बाबूजी आप तो समझदार और पढ़े लिखे हैं क्या आप हमें एक बात समझा सकते हैं?'' जब उसने हाथ जोड़े तो मेरे शरीर में आत्मविश्वास का संचार तेजी से होने लगा और जब उसने मेरे सम्बोधन में समझदार शब्द जोड़ा तो मेरा सीना भी चौड़ा हो गया। मैंने कहा-''हां! हां! पूछो क्या पूछना है।''
           गांव वाले बड़े भोले होते हैं ऐसा मैंने सुना था लेकिन देखा पहली बार। अबकी बार दूसरा बोल पड़ा-''बाबूजी हम पास के गांव से आए हैं।''  एक समाचार पता चला है कि आपकी पंचायत ने कुछ फरमान सुनाए हैं। जिसमें 40 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं को सूर्य अस्त के बाद बाजार न जाने, मोबाइल पर बात न करने, प्रेम प्रसंग न करने और कान में लीड लगाकर गाने न सुनने का फरमान सुनाया गया है। हम भी चाहते हैं कि बढ़ते अपराधों को रोकने की इस दूरगामी योजना को अपनी पंचायत द्वारा अपने भी गांव में लागू कराएं।
         अबकी बार मैंने उनके हाथ जोड़े और कहा-''हां! हमारी पंचायत ने फैसला सुनाया है लेकिन मैंने जितना इस फरमान का अध्ययन किया है उससे इसमें मुझे कई खामियां ज्ञात हुईं हैं।''  खामियां.... हां! हा! खामियां। अब मैं अपनी समझदारी की ओर बढ़ रहा था। मैंने उन्हें बताया कि देखो पंचायत ने फरमान दिया है कि 40 से कम उम्र की महिलाएं सूर्य अस्त होने के बाद घर से बाहर न जाएं। इस बात पर गौर करें तो पहला प्रश्न यह उठता है कि क्या पुरुष पूरे दिन भर घर के बाहर ही घूमते रहते हैं? दूसरा प्रश्न यह है कि सूर्य अस्त होने के बाद महिलाओं को क्या करना है और क्या नहीं यह नहीं बताया गया है? क्या महिलाओं को सूर्य अस्त के बाद घर में खाना बनाना है या नहीं। महिलाओं से कहा गया है कि वह अकेले बाजार न जाएं। इसमें साफ-साफ यह नहीं बताया गया है कि अब बाजार किसके साथ जाएं। क्या वह आपने साथियों, सहेलियों के साथ बाजार जा सकती हैं? इसी तरह का एक और फरमान दिया कि-महिलाएं प्रेम प्रसंग न करें।  इसमें सवाल यह उठता है कि फिर क्या पुरुष को प्रेम प्रसंग करने की छूट दी गई है? पुरुष महिला से प्रेम प्रसंग कर सकता है? मोबाइल की लीड लगाकर गाना न सुनें। देखो कितनी अजीब बात है कि कोई व्यक्ति ध्वनि प्रदूषण होने से पर्यावरण को बचा रहा है तो इसमें भी उन्हें परेशानी है।  उसके खिलाफ ही फरमान जारी कर दिया।
        इसलिए देखो चच्चा..। कई खामियों से भरपूर इस फरमान को अभी से लागू करना ठीक नहीं। वैसे मुझे तो ऐसा लगता है कि ये पंचायतें इस तरह के फरमान जारी कर स्वयं अपनी फजीहत कराते हैं। अरे! कोई फरमान जारी ही करना है तो क्यूं ऐसा फरमान नहीं सुनाते जिससे कि कन्या भ्रूण हत्या, नशाखोरी, भ्रष्टाचार, दहेज प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयों में कमी आए। फरमान सुनाना चाहिए कि पंचायत का सदस्य वही होगा जिसका एक बेटा फौज में होगा, फरमान होना चाहिए कि हमारे गांव का नेता और अधिकारी का बेटा सिर्फ सरकारी स्कूल में ही पढ़ेगा, तब जाकर कोई बात  बनेगी।
         हम अगर इन पंचायतों के ऐसे आलतू-फालतू फरमानों पर फैसले लेने लगे तो सोचो कोई साइना नेहवाल, ज्वाला गुट्टा, डोला बनर्जी, सुनीता विलियम्स, प्रतिभा पाटिल, कृष्णा पुनिया, मैरीकॉम जैसी लाखों प्रतिभाएं क्या पूरी दुनिया में भारत का झण्डा भविष्य में बुलंद कर सकेंगी। अगर ये भी सूर्य अस्त के बाद घर बैठने लगें तो भारत का क्या हाल होगा सोचो जरा...। क्या किसी के कोई अरमान नहीं होते हैं? महिलाओं के अरमानों पर फरमान सुनाने से देश की तरक्की नहीं होगी। मुझे तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि ये पंचायत वाले कहीं सूरज-चांद के आने-जाने का समय ही निर्धारित न कर दें..।

Tuesday, July 10, 2012

कमजोर, फिसड्डी नहीं हैं...


        कोई कुछ करे या न करे। लेकिन मैंने अमेरिका का विरोध करने का सोच लिया है। जब देखो तब यह अमरीका वाले अपनी दादागिरी दिखाते रहते हैं। अभी एक पत्र लिखने की सोच रहा हूं, अमेरिका की ''टाइम'' पत्रिका के सम्पादक को। वाकई में मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है। हमारे भोले-भाले प्रधानमंत्री को ही फिसड्डी कह दिया। जिसने भी हमारे प्रधानमंत्री को ''अंडर अचीवर'' लिखा है वह यदि भारत में रहता तो पता चलता। इतनी महंगाई है कि ''अंडर वीयर'' तक खरीदने के लाले पड़ जाते।
        बड़े आए फिसड्डी कहने वाले। भइया जिस देश का प्रधानमंत्री अपनी कुर्सी बचाने के लिए रोजाना विपक्षी दलों से कबड्डी खेल रहा हो, वह फिसड्डी कैसे हो सकता है, बताइए जरा। कमजोर, असफल और शिखण्डी कहना सब फालतू बातें हैं। इटली वाली मैडम के इशारों पर भारत को चलाना कितनी बहादुरी का काम है, इन्हें क्या पता!
          जिस देश की विकास दर 8 प्रतिशत से 5.3 प्रतिशत पर आ गई हो उसका प्रधानमंत्री बने रहना कोई मजाक है क्या!! कोई भी, कुछ भी आरोप लगा रहा है। अमेरिका की सरकार के 15 मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों तब समझ आता फिसड्डी कौन है और दमदार कौन! सरकार का कोई न कोई मंत्री इस्तीफा दे रहा है। जिसने इतने शानदार राष्ट्र मण्डल खेल  का आयोजन कराया वह मंत्री भी जेल में 2 साल सजा काट कर आया है। संचार क्रांति लाने वाले मंत्री से संतरी तक जेल हो आए, फिर भी सरकार चल रही है। महंगाई भी दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। ऐसे में कोई देश चला रहा है तो उसकी तारीफ करने के बजाए बुरा भला कहना मुझे मूर्खों का काम लगता है।
         एक बात और है। वह यह कि हमारे देश में गठबंधन धर्म भी तो निभाना पड़ता है। आए दिन कोई न कोई सहयोगी दल रूठ जाता है। सरकार बचाने के लिए फिर उनको मनाना पड़ता है कितनी ''टेढ़ी खीर'' होता है। इनके राष्ट्रपति को ममता, मुलायम जैसे नेता मिल जाते तो पता चलता। कितना साधकर चलना पड़ता है। राष्ट्रपति पद पर अपना उम्मीदवार जिताने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ती है कोईसोच सकता है क्या!!
यह ''टाइम'' पत्रिका वाले कुछ तो भी छापते रहते हैं। जो छापने की बात है उसकी ओर तो किसी का ध्यान नहीं है। इसलिए मैंने भी दृढ़ निश्चय कर लिया है पत्रिका के सम्पादक को पत्र लिखकर अपनी भड़ास निकालने का। पत्र लिखकर कहूंगा कि वह अपना पहले दृष्टिकोण बदलें। नकारात्मक की जगह सकारात्मक सोचें । यहां आकर देखो, तब पता लगेगा कि हमारे प्रधानमंत्री कमजोर, फिसड्डी नहीं हैं बल्कि बहुत दमदार हैं। फिसड्डी तो वह हैं जिनका दिमाग ऐसी फिसड्डी बातें करता है।

Tuesday, July 3, 2012

महंगे देश में सस्ता जीवन

     भइया भारत में तो अब रहना मुश्किल हो गया है। अब देखो ना- सरकार ने सेवाकर की दरें भी बढ़ा दी हैं। मोबाइल से बात करने से लेकर  रेस्ट्रां में खाना खाना तक महंगा हो गया है। लेकिन मैंने इस महंगे देश में सस्ते जीवन की तलाश कर ली है। हां! इसके लिए काफी खोजबीन करनी पड़ी। अंत में समझ आया कि आम आदमी से बेहतर तो आतंकवादियों का जीवन है। पुलिस भी आए दिन कोई न कोई आतंकवादी को पकड़ कर रही है। आतंकवादियों की अच्छी खुशामद भी की जाती है।
       खोज में मैंने पाया कि संसद हमले का मुख्य आरोपी मोहम्मद अफजल गुरू आज भी जेल में सुखी जीवन बिता रहा है। 11 साल तक कोई भी उसका बाल भी बांका नहीं कर पाया। इसी प्रकार मुम्बई में 26 /11 के आतंकवादी हमले में पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमीर कसाब पर आज तक करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं। अभी हाल में महाराष्ट्र सरकार के गृहमंत्री आर.आर. पाटिल ने विधान परिषद में जो आंकड़ा प्रस्तुत किया उसमें भी बताया कि सरकार कसाब पर लगभग 21 करोड़ से अधिक खर्च कर चुकी है। पाटिल ने बताया कि 29 फरवरी 2012 तक सरकार ने कसाब के स्वास्थ्य पर 28,066 , सुरक्षा पर 1,22,18 ,406  रुपए, खाने पर 34,975 रुपए खर्च कर दिया है। इसके अलावा भारत-तिब्बत सीमा पुलिस पर महाराष्ट्र सरकार ने 19 करोड़ 28  लाख रुपए खर्च कर दिए हैं। कसाब की इतनी सुरक्षा और खातिरदारी से मैं काफी प्रभावित हुआ हूं। भारत में इससे ज्याद सुरक्षित स्थान और कौन सा हो सकता है...।
    अंदर की बात बताऊं तो पाकिस्तान भी इस बात को समझ गया है। इसलिए आए दिन रोज नए आतंकवादी पकड़ आ रहे हैं। अभी कुछ ही दिन पूर्व जबीउद्दीन अंसारी उर्फ अबू जंदल उर्फ अबू हमजा को हमारी पुलिस ने मुम्बई हमले के मास्टर माइंड के रूप में पकड़ा है। सऊदी अरब से एक और आतंकवादी फसीह महमूद को भारत लाने की तैयारी की जा रही है। अब इन आतंकवादियों को भारत की जेलों में बंद रखा जाएगा। जब तक जांच चलेगी तब तक मस्त खातिरदारी की जाएगी।
         यही अब नई चाल है पाकिस्तान की! पाकिस्तान ने बम धमाकों से हमला करना बंद कर दिया है। अब वह आतंकवादियों को गिरफ्तार करा कर हमारी अर्थव्यवस्था को चौपट करना चाहता है। इसी चाल के तहत उसने 30 साल सजा काट चुके सुरजीत सिंह को रिहा कर दिया। वहां से हमारे लोग रिहा कर भारत भेजे जा रहे हैं।
हमारी सरकार भी ऐसी नासमझ है कि पूछो मत। जो जेल के बाहर हैं वह महंगाई से मरे जा रहे हैं तथा जेल के भीतर जाने वाले आतंकवादियों  की एक-एक ख्वाहिश पूरी की जाती है। वो जो मांगते हैं उन्हें उपलब्ध करा दिया जाता है। इधर महंगाई कम नहीं हो रही उधर सरकार ने सेवाकर की दरें बढ़ा दीं। पता है जुआ, लॉटरी जैसी 38  सेवाओं को छोडक़र 119 सेवाएं महंगी कर दी गई हैं। इसलिए मैं इस महंगे देश में सस्ते जीवन जीने के लिए आतंकवादी बनने की सोच रहा हूं। सोच रहा हूं कि मुम्बई हमले में कहीं न कहीं कोई अपनी भूमिका बताकर एक बार जेल के भीतर पहुंच जाऊं। जब तक जांच चलेगी तब तक तो उम्र कट ही जाएगी...।

Wednesday, June 27, 2012

बड़े साहब की बड़ी कार्रवाई

 
        बात करते-करते बात बोरवेल तक आ गई। बोरवेल आजकल जानलेवा हो गए हैं। बोरवेल में बच्चे गिर जाते हैं, उनकी जान तक चली जाती है। दो सिपाहियों की बातचीत चल ही रही थी कि इतने में थानेदार साहब भी आ गए। घुसते ही चिल्लाते हुए बोले-''रामकिशन इधर आओ, इस इंजीनियर को जेल में डाल दो।''
       वाह! साहब आपने तो कमाल कर दिया-आपने तो माही की मौत के बाद तुरंत कार्रवाई कर दी। कहां से पकड़ लाए हो? तभी थानेदार साहब बोले-अरे यार! ये वो वाला इंजीनियर नहीं है। ये तो किसी दूसरे गांव से पकडक़र लेकर आया हूं। यह आज सुबह अपने कर्मचारियों के साथ गांव में मिल गया था। नया बोरवोल करने के लिए निरीक्षण कर रहा था तभी इसको मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया।
        वाह! साहब, आपकी दूरदृष्टि सोच को तो मानना पड़ेगा। आजकल बोरवेल में बच्चे काफी गिर रहे हैं। ये इंजीनियर गहरा गड्ढा करके चले जाते हैं कम्बख्त हमारी मुसीबत हो जाती है। कहीं कोई बच्चा गिर गया तो फिर बुलाओ सेना को, पुलिस को। मीडिया के सवालों के जवाब देना तक मुश्किल हो जाता है कि बोरवेल करने वाले इंजीनियर के खिलाफ पुलिस क्यों कुछ नहीं करती? आपने तो सभी आने वाली समस्याओं का तत्काल निराकरण कर दिया।
       तुम ठीक कहते हो रामकिशन- थानेदार साहब बोले। मुझे तो लगता है सरकार को एक नया ''बोरवेल रोको कानून'' बनाना चाहिए। इसमें बोरवेल की बात करने वालों को तत्काल सजा दी जानी चाहिए। जो बोरवेल करता हुआ मिला उसके खिलाफ तो सख्त से सख्त कार्रवाई करना चाहिए। हां! साहब आप ठीक कह रहे हो- रामकिशन सिपाही भी हां में हां मिलाते हुए बोला।
        थोड़ी देर बाद रामकिशन बोला- सर मेरे पास एक सुझाव है। साहब हम इस इंजीनियर को गुडग़ांव के मानेसर में बोरवेल में पांच साल की बच्ची माही की मौत का जिम्मेदार बता दे तो कैसा रहेगा। आप बस इसकी जमकर सुताई कर देना खुद व खुद गुनाह कबूल कर लेगा।
           इतने में एक दूसरा सिपाही भी वहां पहुंच गया। वह दो मजदूरों को  पकडक़र लाया था। थानेदार साहब ने पूछा तो उसने बताया कि- साहब ये दो मजदूर कल्लू और मुन्ना हैं। ये दोनों गांव में एक गड्ढा खोदने की योजना बनाते हुए पुलिया के पास मिले हैं। देखो इनके पास से ये गेती और फावड़ा भी मिला है। यह इस बात का सबूत है।ये दोनों गड्ढा खोदकर पानी निकालने की बात कर रहे थे। तभी कल्लू बोला- साहब हम लोग पानी के लिए कुंआ खोदने की योजना बना रहे थे। इतने में थानेदार साहब का पारा और चढ़ गया। चुप करो। बोरवेल में बच्चे गिर रहे हैं, अब  कुंआ खोदकर क्या पूरे गांव को मारोगे....। तुम्हें तो इंजीनियर से भी ज्यादा कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
          शाम के वक्त थानेदार साहब अपने सिपाहियों की पीठ थपथपाते हुए बोले- आज हम लोगों ने अच्छा काम किया है। हमने आने वाली मुसीबतों पर जो कार्रवाई की है वह वाकई में काबिले तारीफ है। उम्मीद है हम ऐसे ही आगे भी कार्रवाई करते रहेंगे। यदि इसी प्रकार भविष्य में कार्रवाई होती रहें तो हम फिर किसी भी माही को मरने नहीं देंगे....। जी साहब! हम ऐसा ही करेंगे- सभी सिपाही एक साथ बोले।

Tuesday, June 19, 2012

नए भारत की नई तस्वीर


            बच्चे बड़े भोले होते हैं। हमारे पड़ोस में रहने वाला पिंकू भी बहुत भोला है। सिर्फ 12 साल का ही तो है। सुबह घर आया था। पिंकू को अभी से ही अपने भविष्य की चिंता होने लगी है। मेरे पास आया, मुझसे कहता है कि अंकल 'मैं बड़ा होकर टूरिस्ट गाइड बनना चाहता हूं।' तब मैंने कहा- 'टूरिस्ट गाइड तो वैसे ही देश में बहुत हैं, जब तू बड़ा होगा तो न जाने कितने हो जाएंगे।' इतने तो देश में पर्यटन स्थल नहीं रह जाएंगे जितने की टूरिस्ट गाइड हो जाएंगे।
     'हां! आपने ठीक कहा, लेकिन मैं फिर भी कुछ अलग स्थल पर्यटकों को दिखाऊंगा। मैंने इसकी तैयारी भी शुरू कर दी है।'
        मैं भी जानता हूं कि पिंकू बड़ा जिद्दी है। अपनी तैयारी की फाइल दिखाते हुए बोला-'यह देखो अंकल मेरे पर्यटन स्थल।'  बाकई में उसके पर्यटन स्थल देखकर मैं भी आश्चर्यचकित था। पिंकू ने पहला पन्ना दिखाते हुए बोला- 'देखो अंकल यह योजना आयोग का दफ्तर है। इस दफ्तर में पर्यटकों को 35 लाख रूपए की लागत से बना हुआ टॉयलेट दिखाया जा सकता है। इसको दिखाने से हमारे देश की साख बढ़ेगी। क्योंकि जब हम 35 लाख रूपए का सिर्फ टॉयलेट बनवा सकते हैं तो फिर अन्य सुविधाओं पर कितना खर्च करते होंगे सोच सकते हैं।'
          इसके बाद यह देखो दिल्ली का रामलीला मैदान। यह वह स्थान है जहां पर कुछ साल पहले कालाधन धन भारत लाने की मांग करने वाले एक देशभक्त बाबा को दिल्ली पुलिस ने बुरी तरह से पीटा था।यही वह स्थान है जहां दिल्ली पुलिस ने जलियांवाला बाग का दृश्य निर्मित किया था। दिल्ली पुलिस जनरल डायर बन गई थी।
इसके बाद यह देखो केन्द्रीय दूरसंचार, कोयला और खेल मंत्रालय। यहां पर्यटकों को बताऊंगा कि यही वह स्थान है जहां पर 2-जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमण्डल और कोयला आवंटन जैसे बड़े-बड़े घोटाले हुए। इसी प्रकार यह देखो राष्ट्रपति भवन। राष्ट्रपति भवन के बारे में बताया जाता है कि यहां देश के प्रथम नागरिक निवास करते हैं। लेकिन इस प्रथम नागरिक को यहां तक पहुंचने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं यह वही जानता है। प्रथम नागरिक बनने के लिए द्वितीय और तृतीय स्तर के नेताओं से जोड़-तोड़ तक करनी पड़ती है। यहां राष्ट्रपति अपनी यात्राओं पर 200 करोड़ रुपए तक खर्च कर देते हैं।
          इसके बाद यह देखिए लखनऊ और मुम्बई। लखनऊ में मायावती के हाथी पार्क। करोड़ों रुपए के हाथी पार्क को घुमने और घुमाने में बड़ा ही आनंद आएगा। ये मुम्बई में आर्थर रोड की जेल। यह भी घुमाऊंगा।
           यही वह जेल है जहां पर मुम्बई पर आतंकी कहर बरपाने वाला आतंकवादी अजमल आमीर कसाब सालों तक हमारे देश में पूरे ठाठ से रखा गया। जब तक हम उसे फांसी दे पाते बिचारा बूढ़ा होकर मर गया।
वाकई में यार पिंकू...! हमारे देश में तो यह भी देखने लायक स्थल हो सकते हैं मैंने तो सोचा ही नहीं था। 'अरे अंकल! ये तो कुछ भी नहीं है अभी तो और भी कुछ देखना बाकी है। नए भारत की नई तस्वीर तो और भी जबर्दस्त होगी...।'

Wednesday, June 13, 2012

बहू सुपुत्री तो का धन संचय

       
   आजकल सासों की सांसें फूल रही हैं। हां! बहुओं की तरक्की किससे देखी जाती है। आश्चर्य हो रहा है कि चौपालों पर, घर की देहरी पर, मंदिर में, क्लब में, उद्यानों में, सत्संगों में, सभी जगह सासों ने बहुओं की बुराई करना भी बंद कर दिया है। सोच भी बदलने लगी है। बहू रोज-रोज बाजार की दौड़ लगाएगी। महंगे-महंगे कपड़े पहनेगी, जेवर बनवाएगी। बहू आएगी तो खर्चे बढ़ जाएंगे। बहू आएगी तो सब अपने आप संभाल लेगी। घर को भी, देश को भी। भगवान से भी एक ही अर्जी लगाई है कि बहू दे तो 'डिंपल' जैसी सिंपल देना। हां क्या पता कब बहू की किस्मत चमक जाए, वह संसद में दिखाई दे। बहू सिंपल होने के साथ-साथ राजनीति में भी थोड़ी रूचि रखती हो। रूचि नहीं भी हो तो चल जाएगा। हम उसे राजनीति समझा देंगे। जनता से वादे ही तो करना है। चुनाव के समय जनता से बीच जाना है। उनके बच्चों को अपने बच्चों की तरह गोदी में उठाकर मम्मी पापा से वोट मांगने की गुजारिश करना है। एक आध गरीब की झोपड़ी में खाना खाने से जीत पक्की समझो। बहू एक बार चुनाव हार भी जाएं तो कोई बात नहीं, दूसरी बार भी आजमा कर देख लेंगे। आज नहीं तो कल जीतेगी ही। एक बार जीत गई तो समझो फिर तो इतिहास बन गया  पूरे घर का। सभी काम नेतागिरी से हो जाएंगे। बेटों और रिश्तेदारों सभी को कहीं न कहीं फिट करा ही देंगे। सच में आजकल राजनीति से अच्छा कुछ नहीं है। मोहल्ले वालों के मुंह भी बंद हो जाएंगे। सबकी सब आगे पीछे घूमेंगे हमारे। जो काम चाहेंगे वह हो जाएगा। अब तो जमाने के ताने का भी डर खत्म हो गया है। जमाना चाहे कुछ भी कहता रहे कि बहू की कमाई की खाएंगे। इसमें कौन सा पाप करेंगे, खा लेंगे। कोई बुराई थोड़ी ही है। बहू काबलियत पर झण्डे गाढ़ेगी। काबिल बनाने वालों को भी कुछ मिलेगा कि नहीं। लोग तो कुछ भी कहते रहेंगे, उनके कहने पर तो घर नहीं चलेगा न। घर तो हमें ही चलाना है। चलाएंगे भी, चुनाव भी लड़ाएंगे। अगर सास का सुख लिखा होगा तो बहू एक न एक दिन चुनाव जरूर जीतेगी। इसके लिए ससुरों ने भी तैयारी कर ली है। अपने दिमाग पर तनाव लेना कम कर दिया है। दिल कठोर की जगह मुलायम हो गया है। मुलायम दिल से मीठी-मीठी बातें बहुओं के लिए अपने आप निकलने लगी हैं। जमाना बदल गया है। बहू के जीतने पर पूरा शहर खुशी से नाच उठेगा। एक दिन देखना यह सुख आएगा भी। अब तो लगने लगा है कि बहू ही हमारा सुनहरा भविष्य संवारेगी। बहू सेवा नहीं करे तो क्या हुआ मेवा तो खिलवाएगी। सोच के साथ-साथ मुहावरे भी बदलने लगे हैं। 'बहू सुपुत्री तो का धन संचय, बहू कुपुत्री तो का धन संचय'। इसलिए हमने भी धन संचय करना भी छोड़ दिया है।

Tuesday, June 5, 2012

तुम क्या जानो पेट्रोल की कीमत!


        भारत बहुत तरक्की कर रहा है। तरक्की हर क्षेत्र में हो रही है। फिर वह चाहे पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि का मामला ही क्यों न हो!! खाना, रहना, चलना, दौडऩा, पढऩा हर क्षेत्र में हम ऊंचाई की ओर बढ़ रहे हैं। हमारी सरकार ने जिस प्रकार से साल दर साल पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए हैं वह भारत के लोगों की तरक्की की ओर ही तो इशारा करते हैं। यह तरक्की नहीं तो और क्या है कि हम पहले 44 रुपए प्रति लीटर पेट्रोल फूंकने में सक्षम थे और आज लगभग 80 रुपए प्रति लीटर फूंकने में भी उतने ही सक्षम हैं। जिस प्रकार पेट्रोल की कीमतें बढ़ रही हैं उससे भविष्य कैसा होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। सबसे पहले बात शिक्षा से शुरू करते हैं। स्कूल की कीताबों में गणित के जो सवाल रहेंगे उनमें कुछ पेट्रोल से संबंधित भी रह सकते हैं। प्रश्न होगा कि 3 साल में सरकार ने 16 बार दाम बढ़ाकर 44 रुपए के पेट्रोल को 80 रुपए में बेचा तो अगले 10 साल में पेट्रोल की कीमत क्या होगी? दूसरा सवाल यह भी पूछा जा सकता है कि एक पेट्रोल कंपनी के मालिक ने नुकसान का ढोल पीटकर एक साल में दस करोड़ रुपए कमाए तो वह 5 साल में कितने रुपए कमाएगा? हिन्दी विषय में विद्यार्थियों से निबंध लिखने को भी कहा जा सकता है। इसका विषय 'पेट्रोल-डीजल के फायदे नुकसान पर अपने विचार व्यक्त कीजिए', भी हो सकता है। स्कूल में पढ़ाने वाले मास्टर जी बच्चों को ट्यूशन पढक़ार उनसे फीस के रूप में रुपए न लेकर पेट्रोल मंगाया करेंगे। अब फिल्मी दुनिया में आते हैं। फिल्मों में संवाद भी कुछ अलग तरीके से खिले एवं बोले जाएंगे। फिल्मों में एक नायक-दूसरे नायक से जब यह सवाल करेगा कि मेरे पास गाड़ी, बंगला है और तुम्हारे पास क्या है? तो दूसरा नायक कहेगा 'मेरे पास पेट्रोल है'!! फिल्म ओम शांति ओम की तरह एक संवाद जिसमें नायिका-नायक से कहेगी कि-एक बूँद पेट्रोल की कीमत तुम क्या जानो चुन्नी बाबू...। नकारात्मक भूमिका निभाने वाले कलाकारों को बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में दिखाने की घोड़ों पर दौड़ता हुआ फिल्माया जाएगा। शादी जैसे सामाजिक कार्य में भी पेट्रोल बड़ा अहम भूमिका अदा करेगा। दहेज लेने की परंपरा तो बंद नहीं होगी, वर पक्ष-वधु पक्ष से यह मांग एक और बढ़ा देगा कि मेरे बेटे को चार पहिए की गाड़ी तो चाहिए ही, साथ ही 100 लीटर पेट्रोल भी देना होगा। इतना ही नहीं बारातियों का स्वागत भी कम से कम 5 लीटर पेट्रोल देकर किया जाए। पेट्रोल देने के बाद ही बात आगे बढ़ेगी। हां! भ्रष्टाचार में भी पेट्रोल के लेन-देन का इस्तेमाल किया जा सकता है। नोट नहीं बल्कि पेट्रोल का इस्तेमाल किया जाएगा। किसी भी सरकारी कार्यालय का बाबू काम करने के बदले में रिश्वत तो लेगा लेकिन वह पेट्रोल के रूप में होगी। बाबू या अधिकारी संबंधित व्यक्ति को स्कूटर या मोटरसाइकिल की चाबी देते हुए बड़े निवेदन के साथ कहेंगे-कृपया इसमें पांच लीटर पेट्रोल डलवा दीजिए आपका काम हो जाएगा। रिश्वत देने वाला व्यक्ति स्वयं इस बात के प्रलोभन देगा कि साहब! आप मेरा यह एक छोटा सा काम करा दें तो मैं आपकी गाड़ी का टेंक फुल करा दूंगा। न जाने क्या-क्या उपयोग करेंगे लोग पेट्रोल का। चुनाव के समय जिंदाबाद, मुर्दाबाद के नारे लगाने वाले लोगों को पेट्रोल का लालच देकर बुलाया जाएगा। पूरे देश में पेट्रोल की अहमियत पहचानी जाएगी। पेट्रोल परेशानी नहीं बल्कि हर समस्या का समाधान होगा। लेकिन समस्या यह है कि लोग पेट्रोल की मूल्य वृद्धि को तरक्की मान ही नहीं रहे हैं। गरीबी रेखा की नई परिभाषा के हिसाब से भी देखा जाए तो गाड़ी चलाना वाला हर व्यक्ति अमीर है, क्योंकि वह 80 रुपए का पेट्रोल भरवा सकता है तो एक दिन में कितने कमाता होगा समझा जा सकता है। गरीबी रेखा में तो 32 रुपए शहर में और 26  रुपए गांव में प्रतिदिन कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। तो भाई साहब! आप खुद सोच सकते हो कि आप कीतने अमीर हो गए हैं! इसलिए देश तरक्की कर रहा है...इसे तरक्की करने दें!!