अखबार में ओलावृष्टि का समाचार देखते ही क्षेत्रीय विधायक चंदन जी बाहर से दु:खी होते हुए और भीतर से मुस्कुराते हुए बोले-'ओ! नो। सो सेड। बड़ा बुरा हुआ। बेचारे किसानों का क्या होगा? उन पर आफत का पहाड़ आकर टूट पड़ा। इतनी भयंकर ओलावृष्टि तो मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखी।' मैं भी वहीं खड़ा था। नेताजी की सूरत बता रही थी कि वह कितने दु:खी है। तभी इतने में नेताजी ने अपने कुछ चेले चपाटों को फोन किया और बोले-'अबे चंगुओं...थोड़ा दु:खड़ा व्यक्त करने जाना है, जल्द आ जाओ फिर चलते हैं।' थोड़ी देर में ही विधायक जी अपने दल बल के साथ नजदीक के एक किसान हरिराम के खेत में पहुंच गए। यहां पहुंचते ही अपनी सूरत पर और अधिक दुखावटी भाव ले आए, फिर फसलों को देखते हुए बोले-'अरे! राम-राम। हरिराम, यह सरसो की फसल तो सब बर्बाद हो गई।' ओले कितने बड़े थे? विधायक जी के इस सवाल पर हरिराम एक तशले में रखे ओले दिखाते हुए बोला-'ये देखिये नेताजी...।' विधायक जी बोले-'अरे वाह! चार दिन पहले बारिश हुई थी और आपके पास ओले अभी तक रखे हुए हैं। बहुत आश्चर्य की बात है' हरिराम-'नेताजी आश्चर्य की कोई बात नहीं है। बल्कि आश्चर्य की बात तो यह है कि आप सबसे आखिरी में आए हैं। हमारे पड़ौसी और अधिकारी तो बारिश के अगले दिन ही आ गए थे। हां! मुझे आप पर पूरा विश्वास था कि आप जरुर आएंगे। आपके आने का ख्याल मुझे बार-बार आ रहा था। इसलिए मैंने ये ओले संभाल कर रख लिए थे। अधिकारियों को एक बार ओले नहीं दिखे तो चल भी जाता है। अधिकारी तो बिना आए भी हमारे नुकसान को नोट कर लेते हैं। बस हमें उनके लिए 'नोट' करना पड़ते हैं। लेकिन आपके सामने ओले आना बहुत जरुरी होता है। आपकी नेतागिरी के कारण ही तो हमें मुआवजा मिलने की उम्मीद बनी रहती है। अलग-अलग पार्टी के आप जैसे समाजसेवियों के आने से हमारी आवाज का भी ख्याल हो जाता है। वरना आजकल कहां सरकारें हमारी ओर देखती हैं।' दौरा करने के बाद नेताजी बड़े प्रसन्न हुए। घर आए तो उन्होंने सबसे पहले वह अखबार उठाया जिसकों पढ़कर वह हरिराम के खेत में पहुंचे थे। अखबार देखकर नेताजी जी फिर मुस्कुराए और बोले-'अरे यार! यह चार दिन पुराना अखबार मेरी टेबिल पर किसने रख दिया था। आगे से ऐसा नहीं होना चाहिए।'
Wednesday, February 27, 2013
नेतागिरी की ओलावृष्टि
अखबार में ओलावृष्टि का समाचार देखते ही क्षेत्रीय विधायक चंदन जी बाहर से दु:खी होते हुए और भीतर से मुस्कुराते हुए बोले-'ओ! नो। सो सेड। बड़ा बुरा हुआ। बेचारे किसानों का क्या होगा? उन पर आफत का पहाड़ आकर टूट पड़ा। इतनी भयंकर ओलावृष्टि तो मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखी।' मैं भी वहीं खड़ा था। नेताजी की सूरत बता रही थी कि वह कितने दु:खी है। तभी इतने में नेताजी ने अपने कुछ चेले चपाटों को फोन किया और बोले-'अबे चंगुओं...थोड़ा दु:खड़ा व्यक्त करने जाना है, जल्द आ जाओ फिर चलते हैं।' थोड़ी देर में ही विधायक जी अपने दल बल के साथ नजदीक के एक किसान हरिराम के खेत में पहुंच गए। यहां पहुंचते ही अपनी सूरत पर और अधिक दुखावटी भाव ले आए, फिर फसलों को देखते हुए बोले-'अरे! राम-राम। हरिराम, यह सरसो की फसल तो सब बर्बाद हो गई।' ओले कितने बड़े थे? विधायक जी के इस सवाल पर हरिराम एक तशले में रखे ओले दिखाते हुए बोला-'ये देखिये नेताजी...।' विधायक जी बोले-'अरे वाह! चार दिन पहले बारिश हुई थी और आपके पास ओले अभी तक रखे हुए हैं। बहुत आश्चर्य की बात है' हरिराम-'नेताजी आश्चर्य की कोई बात नहीं है। बल्कि आश्चर्य की बात तो यह है कि आप सबसे आखिरी में आए हैं। हमारे पड़ौसी और अधिकारी तो बारिश के अगले दिन ही आ गए थे। हां! मुझे आप पर पूरा विश्वास था कि आप जरुर आएंगे। आपके आने का ख्याल मुझे बार-बार आ रहा था। इसलिए मैंने ये ओले संभाल कर रख लिए थे। अधिकारियों को एक बार ओले नहीं दिखे तो चल भी जाता है। अधिकारी तो बिना आए भी हमारे नुकसान को नोट कर लेते हैं। बस हमें उनके लिए 'नोट' करना पड़ते हैं। लेकिन आपके सामने ओले आना बहुत जरुरी होता है। आपकी नेतागिरी के कारण ही तो हमें मुआवजा मिलने की उम्मीद बनी रहती है। अलग-अलग पार्टी के आप जैसे समाजसेवियों के आने से हमारी आवाज का भी ख्याल हो जाता है। वरना आजकल कहां सरकारें हमारी ओर देखती हैं।' दौरा करने के बाद नेताजी बड़े प्रसन्न हुए। घर आए तो उन्होंने सबसे पहले वह अखबार उठाया जिसकों पढ़कर वह हरिराम के खेत में पहुंचे थे। अखबार देखकर नेताजी जी फिर मुस्कुराए और बोले-'अरे यार! यह चार दिन पुराना अखबार मेरी टेबिल पर किसने रख दिया था। आगे से ऐसा नहीं होना चाहिए।'
Wednesday, February 20, 2013
सेंसर बोर्ड हाय-हाय!
व्यंग्य/झुनझना
सुमित 'सुजान'
सेंसर बोर्ड हाय-हाय! सेंसर बोर्ड हाय-हाय! सेंसर बोर्ड की मनमानी नहीं चलेगी-नहीं चलेगी! मेरे कानों में तो ये नारे अभी से ही गंूजने लगे हैं। जबसे सेंसर बोर्ड ने 'आयटम गानों' पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है तबसे पता नहीं क्या हो गया है। मुझे तो मुन्नी, शीला, शन्नो, राखी, बानो, बिजली जैसे बेचारी अदाकाराओं की चिंता होने लगी है। कल ही मुन्नी से मुलाकात हुई थी तो बेचारी बड़ी दु:खी थी। मुन्नी बता रही थी कि हम लोग कितनी मेहनत से तो 'आयटम गानों' की तैयारी करते हैं, उस पर सेंसर बोर्ड वाले अडंगा लगात देते हैं। मुन्नी ने बताया कि उनकी कुछ साथियों ने मिलकर 'ए.जी.ए.' (आयटम गल्र्स ऑर्गनाइजेशन) का गठन कर लिया है। बस कुछ दिनों बाद आंदोलन शुरू हो जाएंगे। मेरे द्वारा ए.जी.ए. के गठन का सवाल पूछते ही वह तपाक से बोली जब अण्णा हजारे, स्वामी रामदेव और अरविंद केजरीवाल जैसे लोग अपने-अपने संगठन बना सकते हैं तो हम क्यों नहीं बना सकते? बातचीत को आगे बढ़ाते हुए मुन्नी बोली कि हमारा आंदोलन सेंसर बोर्ड को झुकाए बिना रुकेगा नहीं। अण्णा हजारे के भूखे रहने से भले ही 'जनलोकपाल बिल' न आया हो लेकिन जब हम लोग ठुमके लगाना बंद कर देंगे तो देश में भूचाल आ जाएगा। बॉलीवुड में सन्नाटा पसर जाएगा। लोग फिल्में देखना ही बंद कर देंगे। हमने तो पर्चे भी छपवा लिए हैं। आपको क्या मालूम फिल्मों में होने वाले 'आयटम गानों' के कितने फायदे हैं। हमारी वजह से बॉलीवुड करोड़ो रुपए कमा रहा है। फिल्में सुपर-डुपर हिट हो जाती हैं। पहले लोगों को हमारे ठुमके और अदाओं को देखने के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ता था लेकिन आजकल तो हम सीधे घरों तक पहुंच जाते हैं। हमारे ठुमकों के साथ-साथ कंपनियां अपने उत्पादों की मार्केटिंग भी आसानी से कर सकती हैं। आपने देखा नहीं क्या हमने तो 'झण्डु बाम', 'फेवीकॉल', 'चिलम' और 'बीड़ी' जैसे उत्पादों का प्रचार भी बड़ी चतुराई से किया है। देखो ना कितनी नाइंसाफी है इतने फायदे होने के बाद भी हमारी भावनाओं को कुचला जा रहा है। हम ऐसा नहीं होने देंगे। सेंसर बोर्ड हाय-हाय!
Wednesday, February 13, 2013
मैं, सरकार और आतंकवादी
व्यंग्य/झुनझुना
कल ऑफिस से लौटते वक्त एक आतंकवादी रास्ते में मिल गया। बेचारा काफी घबराया हुआ था। वैसे तो आतंकवादियों को देखकर सबकी सिट्टी-बिट्टी गुम हो जाती है लेकिन इस बार उसकी गुम थी। उसकी घबराहट से मेरा मनोबल बढ़ रहा था। अपुन भी पूरे तैश में आ गए थे। उसकी आंखें गीली और हमारी लाल हो रही थीं। आखिरकार हमारी सहृदयता ने जवाब दे दिया। मैंने उसकी आंखों से टपक रहे आंसुओं को पहले तो पोंछा, फिर उससे रोने का कारण पूछा! बेचारे आतंकवादी ने अपनी व्यथा को मुझसे बांटते हुए कहा कि आप लोगों के कारण हम अब घबराने लगे हैं। वह बोला हम आतंकवादी भले ही कितने ही सरकार के खिलाफ चले जाएं, कितना ही बड़ा धमाका कर दें, कितने ही निर्दोष लोगों को मौत की नींद सुला दें लेकिन हमें कुछ नहीं होता था। लेकिन जबसे आप लोगों ने सरकार के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दी है तबसे सरकार हमें ही निशाना बनाने लगी है। आतंकवादी रोते हुए बोला 'सरकार पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के दाम तो कम कर नहीं रही लेकिन हमारी संख्या कम करती जा रही है। सरकार ने जब रसोई गैस के दाम बढ़ाए तो उन्होंने आपका ध्यान भटकाने के लिए हमारे साथी कसाब को फांसी पर लटका दिया। अब जब आप लोग जनलोकपाल बिल और बलात्कार के मामले में कानून को बदलने सड़क पर आए तो सरकार ने अफजल को भी फांसी पर लटका दिया।' आतंकवादी बोला- 'पहले सरकार हम पर कितना रहम खाती थी, हम जो चाहते थे हमें मिल जाता था। बिल्कुल दामाद की तरह हमारी खातिरदारी हो रही थी। हमें सरकार पर बहुत भरोसा हो गया था। हमने भरोसे के कारण सैकड़ों साथियों को यहां बुला दिया था। हमने तो मलिक जैसे दो मुखौटे वाले कई 'मलिक' भी भारत में पैदा कर दिए हैं। अब हमें समझ नहीं आ रहा है कि हम किधर जाएं क्योंकि सरकार की नीतियां तो ऐसी हैं कि महंगाई का ग्राफ नीचे जाएगा नहीं, हमारे साथियों का ग्राफ कम होता जा रहा है।' आतंकवादी बहुत दु:खी था। घर पहुंचने के बाद मैंने सोचा कितनी अजीब बात है कि सरकार के हथकंडे वह आतंकवादी तो जानता है लेकिन हमें समझने में इतनी देर क्यों लग रही है...!!!
Friday, February 8, 2013
उल्लूपने की बातें
व्यंग्य/झुनझुना
ये वैज्ञानिक भी खूब होते हैं। लो अब उल्लुओं पर ही शोध कर लिया। खबर है कि वैज्ञानिकों ने उल्लू के सिर घुमाने के रहस्य का पता लगा लिया है। वैज्ञानिकों ने इस बात का पता लगा लिया है कि रात के अंधेरे में उल्लू अपना सिर बगैर किसी दिक्कत के कैसे घुमा लेते हैं। वैज्ञानिकों ने उल्लुओं की एंजियोग्राफी और सीटी स्कैन करके उल्लुओं के इस रहस्य का पता लगाया है। भई वैज्ञानिक तो वैज्ञानिक होते हैं। शोध करना उनका काम है। अपुन तो उनके आगे खुद उल्लू हैं। उल्लू में कई विशेषताएं होती हैं। सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि ये आपको हर शाख पर बैठा हुआ मिल जाएगा। आपने सुना भी होगा...'बर्बाद गुलिस्तां करने को, सिर्फ एक ही उल्लू काफी है; हर शाख पर उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा।' उल्लू कहीं बुरा नहीं मान जाए इसलिए भगवान ने भी काफी सोच समझकर उसे लक्ष्मी जी का वहां बनाया है। लक्ष्मी जी उल्लू पर सवार होती हैं। हम भी उल्लू बनने की कोशिश करते रहे लेकिन कम्बखत मास्साबों ने हमें उल्लू नहीं बनने दिया। आज हम उल्लू होते तो लक्ष्मी जी के लिए इतना तरसना नहीं पड़ता। कम से कम 'उल्लू का पट्ठा' ही बन जाते तो कुछ तो बेहतर स्थिति होती। क्योंकि आजकल तो 'उल्लू के पट्ठे' भी काफी तरक्की कर रहे हैं। उल्लू का पट्ठा कहते-कहते सबने टाईम पास तो किया लेकिन किसी ने न तो उल्लू बनने दिया और न ही पट्ठा। हां लेकिन मेरे उल्लू मन में विद्यमान उल्लूपन कुछ ऊथल-पुथल जरुर मचा रहा है। मेरा उल्लूपन इस बात को जानने के लिए मचल रहा है कि क्या वैज्ञानिक इस रहस्य का पता लगा सकते हैं कि हमारे प्रधानमंत्री जी का सिर मैडम सोनिया की हां में हां क्यों मिलाता है? क्या वैज्ञानिक इस रहस्य का पता लगा सकते हैं कि बाबा राहुल की चमचागिरी करने वाले कांग्रेसियों के सिर किसी भी बात को लेकर न-नुकुर क्यों नहीं करते हैं? क्या वैज्ञानिक इस बात का पता लगा सकते हैं कि हमारे नेताओं के दिमाग में ऐसा कौन सा तत्व आ जाता है जिसके कारण उन्हें हिन्दुओं में आतंकवादी और आतंकियों में राष्ट्रवादी नजर आते हैं। वैज्ञानिक जरा इस बात पर शोध करके पता लगाएं कि देश की रक्षा करने वाले शहीदों के सिर जब सरहद पर काटे जाते हैं तो हमारे नेताओं के सिर शर्म से झुकते क्यों नहीं हैं? भ्रष्टाचार, हत्या, घोटोले जैसे मामलों में जब नेता और अधिकारियों को जेल भेजा जाता है तो उनके सिर उठे हुए कैसे रहते हैं? अब बाकी बातें आप भी सोचिए, मेरे उल्लूपने की बातों पर आप अपना सिर क्यों हिला रहे हैं!!!
Friday, February 1, 2013
आम आदमी का ट्विट
लो अब देश के 'रतन' टाटा जी ने भी ट्विट कर
दिया। ट्विट करते हुए टाटा कह रहे हैं कि जबसे उन्होंने अपने काम से 'टाटा'
(सेवानिवृत्त) किया है तब से उनकी जिन्दगी मजे में बीत रही है। उनका अधिकतर
समय अपने पालतू कुत्तों के साथ बीत रहा है। भई आजकल जिसे देखो ट्विट कर
देता है। ये ट्विट करने का फंडा जिस प्रकार से चल निकला है उससे मुझे
भविष्य का अनोखा भारत दिखाई दे रहा है। मान लो कि 125 करोड़ की आबादी वाले
इस देश में सभी ट्विट और फेसबुक पर कमेन्ट करने लगें तो कैसा होगा। सबकुछ
टेक्निकल हो जायेगा। रिश्वत ट्विट करके मांगी जाएगी। न्यायलय भी ट्विट करके
अपने फैसले देंगे। सरकारें भी ट्विट करके अपनी योजनायें बता देंगी। शिक्षक
और छात्र ट्विट करके ज्ञान का आदान-प्रदान करेंगे। पाकिस्तान के सैनिक जब
घिनौना कृत्य कर हमारे सैनिकों को मौत के घात उतरेंगे तब हमारे देश के
राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, गृहमंत्री, विदेशमंत्री ट्विट कर कड़ी चेतावानी
देंगे। हमारे देश में जब भी कोई आतंकवादी वारदात होगी तब नेता ट्विटर पर ही शोक व्यक्त करके चेतावनी देंगे। सरकार सिलेंडर, पेट्रोल, डीज़ल, केरोसिन के
दाम बढाने की घोषणा भी ट्विट करके दे देगी। हमारे मुलायम सिंह, मायावती,
शिबू सोरेन जैसे नेता ट्विटर सन्देश देकर सरकार के लिए संकट खड़ा कर देंगे,
उन्हें बार-बार दिल्ली आने की जरुरत भी नहीं होगी। हाँ सबसे ज्यादा कष्ट
फिर आम आदमी को ही होगा। बेचारा जैसे ही सरकार या व्यवस्था के खिलाफ कुछ भी
ट्विट करेगा तो उसे जेल में ठूस दिया जायेगा। बेचारा आम आदमी।
Wednesday, January 23, 2013
हमारा चिंतन
व्यंग्य/झुनझुना
बेटा होने पर खुशी होती है लेकिन हमारे रामदीन जी तो सुबह से ही चिंता में डूबे हुए थे। आजकल जयपुर में रहते-रहते सबकी हालत कांगे्रस की तरह हो गई है। बात-बात के लिए चिंतन होने लगता है। खैर हमारे रामदीन जी की चिंता अपने बेटे के नामकरण के लिए थी। रामदीन जी मेरे पास आए और बोले-'यार... बेटा तो हो गया लेकिन इसका क्या नाम रखना चाहिए, आप कुछ बता सकते हो क्या?' मैंने कहा- 'देखो भाई रामदीन। नामकरण ऐसे एकदम नहीं होता। आप और मैं चिंतन करते हैं शायद कोई नाम निकल आए।' 'हां यह ठीक रहेगा'-रामदीन जी बोले।
थोड़ी देर चिंता करने के बाद मैंने रामदीन जी से कहा- 'इसका नाम 'मनमोहन रख दो'। 'मनमोहन' नाम सुनते ही रामदीन जी हंसते हुए बोले- 'अरे नहीं...नहीं...।' यह नाम नहीं रखना। इस नाम के व्यक्ति बड़े पद पर पहुंचकर एकदम 'मौन' हो जाते हैं। खुद कोई निर्णय नहीं ले पाते, हमेशा किसी न किसी के इशारों पर चलते हैं। इसलिए इसके अलावा कोई दूसरा नाम सोचिए हुजूर...।
इसके बाद मुझे एक नाम और सूझा 'ओमप्रकाश'। तब रामदीन जी बोले-'यार... आपको मेरे बेटे को जेल में भेजना है क्या। 'ओमप्रकाश' नाम के व्यक्तियों का वैसे ही समय ठीक नहीं चल रहा है। बड़े होकर कहीं कोई घोटाला कर दिया तो सीधे जेल में ही जाना पड़ेगा। कुछ और सोचो।'
अब एक नाम रामदीन जी ने सुझाया, इसका नाम 'नरेन्द्र' रख देते हैं। मैंने कहा-'देखो भाई 'नरेन्द्र' नाम तो ठीक है लेकिन इसकी तरक्की कई लोगों से देखी नहीं जाती है। अपने ही लोग इसे आगे बढऩे से रोकते हैं। बेचारे की पूरी जिंदगी अपने ही लोगों से जूझते-जूझते कट जाएगी, इसलिए दूसरे नाम पर विचार करना ठीक रहेगा।'
'मुलायम' कैसा रहेगा'-मैंने एक और नाम ध्यान में लाया। रामदीन जी ने इसे भी मना करते हुए कहा-'इस नाम के व्यक्ति नाम के विपरीत आचरण करते हैं। 'मुलायम' नाम का व्यक्ति हमेशा कहता कुछ है और करता कुछ है। इसके मन में हमेशा किसी न किसी तरह का लालच रहता है।'
फिर अचानक हम दोनों ने एक ही समय पर एक ही नाम बोला-'राहुल'! रामदीन जी बोले-'हां यार... यह नाम एकदम ठीक रहेगा। इस नाम वाले व्यक्ति के रास्ते में कोई रुकावट नहीं आती। अपनी नौटंकियों और चालाकियों से लोगों की भावनाओं से खेलता हुआ तरक्की पाता जाता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात कभी-कभी तो 'सत्ता का जहर' भी पीने का मौका आया तो वह भी पी लेगा।'
आखिरकार हमारा चिंतन भी कांग्रेस की तरह 'राहुल' पर आकर ही समाप्त हुआ। चिंतन करने से चिंता समाप्त हो गई। यह हमने तो अनुभव करने देख लिया, आप भी कर सकते हैं।
Wednesday, January 16, 2013
नेता और आम आदमी
''पता है हम पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने जा रहे हैं। इस बार तो हम छोड़ेंगे ही नहीं, देखना आप...!''
''अच्छा तो क्या करेंगे?''
''बस आप देखते जाइए...।''
''हां! देख ही तो रहे हैं।''
नेता और एक आम आदमी के बीच हो रही इस तरह की बातचीत सुनी तो मेरे कानों ने मेरी ही नहीं सुनी और लग गए बातें सुनने।
आम आदमी-'जबसे हमने पाकिस्तान सैनिकों द्वारा हमारे सैनिक के सिर काटने की घटना सुनी तो मेरा तो खून ही खौल गया।
नेता- 'अरे वाह! आपका खून तो काफी ठीक है, हमारा तो अभी तक नहीं खौला।'
आम आदमी-'आप कबसे कड़ी कार्रवाई करने जा रहे हैं?'
नेता-'आप क्या कह रहे हैं बॉस...!! हमने तो घटना वाले दिन से ही कार्रवाई शुरू कर दी थी। हमने अपने पूरे मंत्रालय को पाकिस्तान के खिलाफ सबूत जुटाने के निर्देष जारी कर दिए थे। जल्दी ही फाइल बनकर आने वाली है, फिर देखना आप!'
आम आदमी-'अच्छा फाइल बनने के बाद क्या करोगे?'
नेता-'एक बार फाइल बन जाएगी तब हम इसे देश की जनता के सामने रखेंगे। कहेंगे कि हम खाली हाथ नहीं बैठे हैं। हम इस मामले में चुप बैठने वाले नहीं हैं। हम मामले को अमेरीका तक ले जाएंगे। अमेरीका को बताएंगे कि हमारे सबूत पुख्ता हैं कि हमारे सैनिकों को पाकिस्तान ने मारा है।' हमारे सैनिकों का कोई दोष नहीं है, असली दोष पाकिस्तान के सैनिकों का है।
आम आदमी-'अच्छा! इससे क्या होगा?'
नेता-'अरे भाई इससे होना जाना तो कुछ नहीं है लेकिन करना पड़ता है। कहीं आपको यह न लगे कि हम कुछ नहीं कर रहे हैं। क्या है कि आज आप लोग काफी समझदार हो गए हैं। बात-बात पर आंदोलन करना सीख गए हो। अभी दिल्ली में बलात्कारियों को फांसी देने के लिए आंदोलन कर दिया था। बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ाया है।'
आम आदमी-'आप एक बार आक्रमण करके पाकिस्तान को हरा क्यों नहीं देते?'
नेता-'देखिए भाई...। हम पाकिस्तान को धूल चटाने का प्रयास समय-समय पर करते रहते हैं। हमने पिछले दिनों ही एक क्रिकेट श्रृंखला का आयोजन किया था। क्रिकेट में तो हम हार गए लेकिन हम जल्दी ही हॉकी का मैच कराने वालेे हैं। देखना हॉकी में तो जरूर धूल चटा देंगे।'
आम आदमी-'अच्छा छोड़ो! आप पाकिस्तान से संबंध क्यों नहीं तोड़ देते?'
नेता-'यार तुम सवाल बहुत करते हो। संबंध ऐसे नहीं टूटते हैं। संबंध तोडऩे से पहले दो-चार बार चेतावनी देना पड़ती है।'
आम आदमी-'लेकिन आप चेतावनी तो कई बार दे चुके हैं!'
नेता-'अरे वो सारी चेवातनी तो मुम्बई हमले के संबंध में दी थी। अब यह नया मामला है। अब हम नए तरीके से चेतावनी दे रहे हैं।'
आद आदमी-'अच्छा! तो यह बताइए कि शहीदों के परिवारों को न्याय कब तक मिल जाएगा।'
नेता-'देखो मुझे न्याय का तो पता नहीं लेकिन हम शहीदों के परिवारों को वीरता पुरस्कार जरूर देने जा रहे हैं।'
Wednesday, January 9, 2013
धन्यवाद गृहमंत्री जी...!
किसी भी घटना पर कोई
कदम उठाना अपने आप में बड़ी बात होती है। कड़े कदम उठाना तो और भी बड़ी
बात। क्योंकि हमारे देश में कड़े कदम उठाने से पहले व्यक्ति, धर्म, जाति का
ख्याल रखना पड़ता है। कड़े बयान तो चाहे आप कभी भी दिलवा लो, लेकिन कड़े
कदम उठाने के लिए अनुमति लेना ही पड़ती है। कहीं मैडम नाराज हो गईं तो! कई
बार तो अनुमति लेने में इतने वर्ष बीत जाते हैं कि लोग उस घटना को ही भूल
जाते हैं कि यह कड़ा कदम किस घटना के लिए उठाया गया है। हमारे गृहमंत्री भी
महिलाओं एवं कमजोर तबके के लोगों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकने
के लिए कड़े कदम उठाने की बात कह रहे हैं। गृहमंत्री जी कह रहे हैं कि
भारतीय सभ्यता बताती है कि हर महिला माता, पत्नी, बहन और बेटी होती है। यह
बात बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है कि हमारे समाज में महिलाएं डर के साए में
रहे। समाज के सभी लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार का काम है। इस बात
के लिए तो वास्तव में गृहमंत्री जी को बहुत-बहुत धन्यवाद देने की हार्दिक
इच्छा हो रही है। क्योंकि उन्होंने याद दिलाया कि समाज के सभी लोगों की
सुरक्षा करना सरकार का काम है। वरना मैं तो यह भूल ही गया था। आजकल देश में
जिस प्रकार से केन्द्र में सरकार कार्य कर रही है उससे मैं तो यह समझ रहा
था कि सरकार सिर्फ घोटाला करने के लिए होती हैं। मैं समझता था कि सरकार जन
आंदोलनों को कुचलने के लिए होती हैं। ऐसा लगता था कि सरकार केवल
उद्योगपतियों के इशारों पर चलती है। मैं समझता था कि सरकार केवल अपने तरीके
से सीबीआई और लोकायुक्तों का प्रयोग करने के लिए होती है। मैं तो समझता था
कि सरकार का काम सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर अपने विचार व्यक्त करने वाले
लोगों को गिरफ्तार करना होता है। मैं समझता था कि सरकार का काम राष्ट्रवादी
संगठनों को सांम्प्रदायिक बताकर देश की एकता और अखण्डता को प्रभावित करना
होता है। हम तो समझते थे कि सरकार रक्षा बजट में 10 हजार करोड़ रुपए की
कटौती करने के लिए होती हैं। हम तो समझते थे कि सरकार दुश्मनों के साथ
क्रिकेट खेलने के लिए होती है। अच्छा हुआ गृहमंत्री जी ने मेरे भ्रम को
जल्दी दूर कर दिया। मैं लोगों से यूं ही उलझ जाया करता था। अब मैं उनसे बात
तो कर सकता हूं कि देखो सरकार का काम हमारी सुरक्षा करना है। कभी-कभी
अपवाद हो जाता है जब पुलिस सुरक्षा करने के बजाए थाने की सीमा विवाद के
चक्कर में उलझ जाती है और पीडि़त दुनिया से चल बसता है। कभी-कभी अपवाद हो
जाता है जब सरकार पर कार्रवाई के लिए दबाव बनाने के लिए प्रदर्शन करना
पड़ता है। धन्यवाद गृहमंत्री जी...!
Wednesday, January 2, 2013
हमें शर्म आई क्या?
देश संभालना, घर संभालने से कई गुना आसान है। इस बात का एहसास आज
हमारे पड़ोसी नेताजी को हुआ। पूरे देश में जिस तरह मायूसी का माहौल है, ठीक
उसी प्रकार नेताजी की पत्नी का चेहरा भी सुबह से ही मायूस था। इसी बीच
पत्नी झल्लाते हुए बोली-'आपको शर्म तो आती नहीं। कम से कम हमारा ख्याल तो
रख लिया करो। पूरे मोहल्ले में नाक कटवा दी आपने। सुबह से ही ताने सुनने को
मिल रहे हैं। सुबह ही गुप्ता जी की मिसेज कह रही थीं कि दुष्कर्म की
पीडि़त 'दामिनी' ने दम तोड़ दिया है और नेताजी बिल्कुल भी शर्मिंदा नहीं
हैं। कम से कम ऐसे समय में तो अपने 'घडिय़ाली आंसुओं' का इस्तेमाल कर लिया
कीजिए।' पत्नी की झल्लाहट के बाद नेताजी हंस दिए। हंसते हुए बोले-'अरे
भाग्यवान' तुम भी ना... जरा-जरा सी बात को दिल पर ले लेती हो। मैंने जिस
दिन से यह चोला धारण किया है तब से शर्म बची ही कहां है! अब शर्म बाजार में
तो मिलती नहीं कि खरीद लाऊं। वैसे भी हम ऐसे शर्मिंदगी महसूस करने लगें तो
फिर चलने लगीं सरकारें! अगर हमें शर्म आती तो हम कब का जनलोकपाल बिल ले
आते। संसद में हम जनलोकपाल बिल को क्यों फाड़ते? तुम ही बताओ! हमारे
साथियों ने टू-जी स्पेक्ट्रम आवंटन, कोयला खदान आवंटन, राष्ट्र मण्डल खेल,
आदर्श सोसायटी जैसे कितने घोटाले किए लेकिन किसी को शर्म आई क्या? हमारे
साथी तो एनजीओ बनाकर विकलांगों की वैशाखियों तक के करोड़ों रुपए डकार गए,
कभी शर्म आई क्या? चलो काला धन को ही ले लो। बेचारे बाबा कब से कह रहे हैं
कि देश में काला धन वापस आना चाहिए। हम लाए क्या? उल्टा हमने रामलीला मैदान
को जलियावाला बाग बना दिया। हमें शर्म आई क्या? आतंकवाद के खिलाफ कितने
कड़े कदम उठाए लेकिन पाकिस्तान के मंत्री भारत आए तो हमने उन्हें पलकों पर
बैठाया, क्रिकेट मैच हो रहे हैं। हमें शर्म आई क्या? महंगाई कहां से कहां
पहुंच गई, पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, हमारे लोगों ने छोटे
व्यापारियों का दम तोडऩे के लिए एफडीआई को मंजूरी भी दिलवा दी, संसद पर
हमला हुआ, हमने स्मारक बनाने में करोड़ों रुपए फंूक दिए, हमने ही एक परिवार
को 600 रुपए प्रतिमाह परिवार चलाने के लिए कहा और हम ही अपने भोज में 29
लाख रुपए खर्च करते हैं, हम एकता की बात करते-करते आरक्षण में भी आरक्षण के
लिए प्रयास कर रहे हैं। हमने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की वस्तुओं की
नीलामी को भी नहीं रोका। जब हमको ऐसे किसी भी मामले में शर्म नहीं आई तो अब
इस घटना पर भी शर्मिंदगी महसूस होना काफी मुश्किल है? हां! अगर तुम कहती
हो तो मैं कोशिश करके देख सकता हूं!!!
Wednesday, December 26, 2012
माननीयों की मानहानि
आज सुबह-सुबह
मेरा 'मन' से झगड़ा हो गया। लगभग डेढ़ घंटे तक बहस हुई। ओह! सॉरी। 'मन' से
आप मेरा आशय शायद गलत समझ रहे होंगे, इसलिए अभी क्लीयर करना जरुरी है।
'मन' से मेरा मतलब, जो मस्तिष्क से जुड़ा रहता है, जो सोचता बहुत कुछ है
लेकिन काम कम करता है। 'मन' से मेरा मतलब हमारे माननीय प्रधानमंत्री डॉ.
मनमोहन सिंह कतई नहीं है। क्योंकि मनमोहन सिंह जी को बहस करना कहां आती है,
झगड़ा करना तो दूर की बात है। प्रधानमंत्री जी को अगर बहस करना आती होती
तो आज देश की स्थिति कुछ और होती। खैर छोड़ो! आप तो अपना 'मन' मेरे 'मन' की
बातों पर लगाइए। मेरा 'मन' मुझसे कह रहा था कि आजकल देश में जिसे देखो
मानहानि का केस कर रहा है। न जाने कितने माननीयों ने अपना मानहानि का दावा
कितने माननीयों पर कर दिया है। आपको भी अपनी मानहानि का हिसाब तो लगा ही
लेना चाहिए। मैंने अपने 'मन' को बहुत समझाया कि भाई! मानहानि के लिए माननीय
होना बहुत जरुरी है। मानहानि का दावा वह लोग करते हैं जिनका हमारे देश में
'मान' होता है, और जो लोग शान से जीते हैं। मेरे पास तो केवल ईमान है,
जिसके साथ जीने में ही बहुत तकलीफ होती है। मैंने 'मन' को स्वप्न सुंदरी,
सिने अदाकारा राखी सावंत जी का उदाहरण देते हुए समझाया कि भले ही वह आइटम
गानों पर फूहड़ नृत्य करतीं हो, भले ही गायक कलाकार मीका ने उनका सार्वजनिक
स्थान पर चुंबन लिया हो लेकिन फिर भी समाज में वह माननीय तो हैं ही।
माननीय थीं तभी तो उन्होंने दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गज नेता पर मानहानि का
दावा किया। इसी प्रकार आप जी न्यूज समाचार चैनल के संपादकों को ही देख लो।
100 करोड़ की रिश्वत मांगने उन्हें जेल हुई। जेल से बाहर आते ही उन्होंने
सबसे पहले नवीन जिंदल पर मानहानि का दावा किया। तो क्या हुआ उन्होंने 100
करोड़ रिश्वत में मांगे थे, लेकिन वे माननीय तो हैं। मैंने 'मन' को समझाया
कि मानहानि का दावा करना आजकल हमारे देश में आम बात हो गई है। अभी एक और
मानहानि का दावा नितिन गड़करी ने भी किया। वह तो अच्छा हुआ कि हमने
आतंकवादी कसाब को जल्दी फांसी पर लटका दिया वरना वह भी हम पर मानहानि का
दावा ठोक देता। 'मन' मेरी बात से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं था। वह कहने लगा
आप भले ही अपने आपको माननीय नहीं मानते हों, लेकिन मेरी मानहानि तो मत
कीजिए। वह एकदम गुस्से में आ गया और बोला- 'आपने मेरी बात नहीं बात मानी
है, आपने सरेआम मेरी बेज्जती की है, इसलिए मैं भी आप पर मानहानि का दावा
करूंगा।
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